भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता २.५२ ·

English

मूल श्लोक

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

yadā te mohakalilaṃ buddhirvyatitariṣyati tadā gantāsi nirvedaṃ śrotavyasya śrutasya ca

२.५२अध्याय २ · साङ्ख्ययोग७२ में से श्लोक ५२

अनुवाद

जब तेरी बुद्धि मोह के गँदले आवरण से पार हो जाएगी, तब उन बातों से तू विरक्त हो जाएगा जो सुनी हैं और सुनने की हैं।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

अर्थात् तुझे कुछ अधिक सुनने की इच्छा न होगी; क्योंकि इन बातों के सुनने से मिलने वाला फल तुझे पहले ही प्राप्त हो चुका होगा। 'निर्वेद' शब्द का उपयोग प्रायः संसारी प्रपंच से उकताहट या वैराग्य के लिए किया जाता है। इस श्लोक में उसका सामान्य अर्थ 'ऊब जाना' या 'चाह न रहना' ही है। अगले श्लोक से देख पड़ेगा, कि यह उकताहट, विशेष करके पीछे बतलाए हुए, त्रैगुण्य-विषयक श्रौत कर्मों के सम्बन्ध में है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय २, श्लोक २.५२