मूल श्लोक
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
yadā te mohakalilaṃ buddhirvyatitariṣyati tadā gantāsi nirvedaṃ śrotavyasya śrutasya ca
अनुवाद
जब तेरी बुद्धि मोह के गँदले आवरण से पार हो जाएगी, तब उन बातों से तू विरक्त हो जाएगा जो सुनी हैं और सुनने की हैं।
टिप्पणी
अर्थात् तुझे कुछ अधिक सुनने की इच्छा न होगी; क्योंकि इन बातों के सुनने से मिलने वाला फल तुझे पहले ही प्राप्त हो चुका होगा। 'निर्वेद' शब्द का उपयोग प्रायः संसारी प्रपंच से उकताहट या वैराग्य के लिए किया जाता है। इस श्लोक में उसका सामान्य अर्थ 'ऊब जाना' या 'चाह न रहना' ही है। अगले श्लोक से देख पड़ेगा, कि यह उकताहट, विशेष करके पीछे बतलाए हुए, त्रैगुण्य-विषयक श्रौत कर्मों के सम्बन्ध में है।
— Lokmanya Tilak