भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता २.५४ ·

English

मूल श्लोक

अर्जुन उवाच ।स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

arjuna uvāca sthitaprajñasya kā bhāṣā samādhisthasya keśava sthitadhīḥ kiṃ prabhāṣeta kimāsīta vrajeta kim

२.५४अध्याय २ · साङ्ख्ययोग७२ में से श्लोक ५४

अनुवाद

अर्जुन ने कहा: हे केशव! (मुझे बतलाओ कि ) समाधिस्थ स्थितप्रज्ञ किसे कहे? उस स्थितप्रज्ञ का बोलना, बैठना और चलना कैसा रहता है?

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

इस श्लोक में 'भाषा' शब्द 'लक्षण' के अर्थ में प्रयुक्त है और हमने भाषान्तर, उसकी भाष् धातु के अनुसार 'किसे कहें' किया है। गीतारहस्य के बारहवें प्रकरण ( पृ. 366 – 367) में स्पष्ट कर दिया है कि स्थितप्रज्ञ का बर्ताव कर्मयोगशास्त्र का आधार है और इससे अगले वर्णन का महत्त्व ज्ञात हो जाएगा।

— Lokmanya Tilak

अध्याय २, श्लोक २.५४