मूल श्लोक
अर्जुन उवाच ।स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
arjuna uvāca sthitaprajñasya kā bhāṣā samādhisthasya keśava sthitadhīḥ kiṃ prabhāṣeta kimāsīta vrajeta kim
अनुवाद
अर्जुन ने कहा: हे केशव! (मुझे बतलाओ कि ) समाधिस्थ स्थितप्रज्ञ किसे कहे? उस स्थितप्रज्ञ का बोलना, बैठना और चलना कैसा रहता है?
टिप्पणी
इस श्लोक में 'भाषा' शब्द 'लक्षण' के अर्थ में प्रयुक्त है और हमने भाषान्तर, उसकी भाष् धातु के अनुसार 'किसे कहें' किया है। गीतारहस्य के बारहवें प्रकरण ( पृ. 366 – 367) में स्पष्ट कर दिया है कि स्थितप्रज्ञ का बर्ताव कर्मयोगशास्त्र का आधार है और इससे अगले वर्णन का महत्त्व ज्ञात हो जाएगा।
— Lokmanya Tilak