भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता २.५ ·

English

मूल श्लोक

गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।हत्वाऽर्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान्रुधिरप्रदिग्धान् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

gurūnahatvā hi mahānubhāvān śreyo bhoktuṃ bhaikṣyamapīha loke hatvā'rthakāmāṃstu gurūnihaiva bhuñjīya bhogānrudhirapradigdhān

२.५अध्याय २ · साङ्ख्ययोग७२ में से श्लोक ५

अनुवाद

महात्मा गुरु लोगों को न मार कर इस लोक में भीख माँग करके पेट पालना भी श्रेयस्कर है; परन्तु अर्थ-लोलुप (हो तो भी) गुरु लोगों को मार कर इसी जगत में मुझे उनके रक्त से सने हुए भोग भोगने पड़ेंगे।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

'गुरु लोगों' इस बहुवचनान्त शब्द से 'बड़े बुढ़ों' का ही अर्थ लेना चाहिए। क्योंकि विद्या सिखलाने वाला गुरु एक द्रोणाचार्य को छोड़, सेना में और कोई दूसरा न था। युद्ध छिड़ने के पहले जब ऐसे गुरु लोगों – अर्थात् भीष्म, द्रोण और शल्य – की पादवन्दना कर उनका आशीर्वाद लेने के लिए युधिष्ठिर रणाङ्गण में अपना कवच उतार कर, नम्रता से उनके समीप गए, तब शिष्ट-सम्प्रदाय का उचित पालन करने वाले युधिष्ठिर का अभिनन्दन कर सब ने इसका कारण बतलाया, कि दुर्योंधन की ओर से हम क्यों लड़ेंगे; अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित्। इति सत्यं महाराज बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः॥ मभा॰ भी॰ अ॰ 43, श्लो॰ 35, 50, 73॥ 'सच तो यह है कि मनुष्य अर्थ का गुलाम है, अर्थ किसी का गुलाम नहीं; इसलिए, हे युधिष्ठिर महाराज! कौरवों ने मुझे अर्थ से जकड़ रखा है।' ऊपर जो यह 'अर्थ-लोलुप' शब्द है, वह इसी श्लोक के अर्थ का द्योतक है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय २, श्लोक २.५