मूल श्लोक
गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।हत्वाऽर्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान्रुधिरप्रदिग्धान् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
gurūnahatvā hi mahānubhāvān śreyo bhoktuṃ bhaikṣyamapīha loke hatvā'rthakāmāṃstu gurūnihaiva bhuñjīya bhogānrudhirapradigdhān
अनुवाद
महात्मा गुरु लोगों को न मार कर इस लोक में भीख माँग करके पेट पालना भी श्रेयस्कर है; परन्तु अर्थ-लोलुप (हो तो भी) गुरु लोगों को मार कर इसी जगत में मुझे उनके रक्त से सने हुए भोग भोगने पड़ेंगे।
टिप्पणी
'गुरु लोगों' इस बहुवचनान्त शब्द से 'बड़े बुढ़ों' का ही अर्थ लेना चाहिए। क्योंकि विद्या सिखलाने वाला गुरु एक द्रोणाचार्य को छोड़, सेना में और कोई दूसरा न था। युद्ध छिड़ने के पहले जब ऐसे गुरु लोगों – अर्थात् भीष्म, द्रोण और शल्य – की पादवन्दना कर उनका आशीर्वाद लेने के लिए युधिष्ठिर रणाङ्गण में अपना कवच उतार कर, नम्रता से उनके समीप गए, तब शिष्ट-सम्प्रदाय का उचित पालन करने वाले युधिष्ठिर का अभिनन्दन कर सब ने इसका कारण बतलाया, कि दुर्योंधन की ओर से हम क्यों लड़ेंगे; अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित्। इति सत्यं महाराज बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः॥ मभा॰ भी॰ अ॰ 43, श्लो॰ 35, 50, 73॥ 'सच तो यह है कि मनुष्य अर्थ का गुलाम है, अर्थ किसी का गुलाम नहीं; इसलिए, हे युधिष्ठिर महाराज! कौरवों ने मुझे अर्थ से जकड़ रखा है।' ऊपर जो यह 'अर्थ-लोलुप' शब्द है, वह इसी श्लोक के अर्थ का द्योतक है।
— Lokmanya Tilak