मूल श्लोक
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।यानेव हत्वा न जिजीविषाम: तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
na caitadvidmaḥ kataranno garīyo yadvā jayema yadi vā no jayeyuḥ yāneva hatvā na jijīviṣāma: te'vasthitāḥ pramukhe dhārtarāṣṭrāḥ
अनुवाद
हम जय प्राप्त करें या हमें (वे लोग) जीत लें – इन दोनों बातों में श्रेयस्कर कौन है, यह भी समझ नहीं पड़ता। जिन्हें मार कर फिर जीवित रहने की इच्छा नहीं वे ही ये कौरव ( युद्ध के लिए) सामने डटे हैं!
टिप्पणी
'गरीयः' शब्द से प्रगट होता है कि अर्जुन के मन में 'अधिकांश लोगों के अधिक सुख' के समान कर्म और अकर्म की लघुता-गुरुता ठहराने की कसौटी थी; पर वह इस बात का निर्णय नहीं कर सकता था कि उस कसौटी के अनुसार किसकी जीत होने में भलाई है। गीता रहस्य पृ. 83 – 85 देखो।
— Lokmanya Tilak