मूल श्लोक
यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके ।तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
yāvānartha udapāne sarvataḥ samplutodake tāvānsarveṣu vedeṣu brāhmaṇasya vijānataḥ
अनुवाद
चारों ओर पानी की बाढ़ आ जाने पर कुएँ का जितना अर्थ या प्रयोजन रह जाता है (अर्थात् कुछ भी काम नहीं रहता), उतना ही प्रयोजन ज्ञान-प्राप्त ब्राह्मण को सच (कर्मकाण्डात्मक) वेद का रहता है (अर्थात् सिर्फ काम्यकर्मरूपी वैदिक कर्मकाण्ड की उसे कुछ आवश्यकता नहीं रहती)।
टिप्पणी
इस श्लोक के फलितार्थ के सम्बन्ध में मतभेद नहीं है। पर टीकाकारों ने इसके शब्दों की नाहक खींचातानी की है। 'सर्वतः संप्लुतोदके' यह सप्तम्यन्त सामासिक पद है। परन्तु इसे निरी सप्तमी या उदपान का विशेषण भी न समझकर 'सति सप्तमी' मान लेने से, 'सर्वतः संप्लुतोदके सति उदपाने यावानर्थः ( न स्वल्पमपि प्रयोजनं विद्यते) तावान् विजानतः ब्राह्मणस्य सर्वेषु वेदेषु अर्थः' – इस प्रकार किसी भी बाहर के पद को अध्याहृत मानना नहीं पड़ता, सरल अन्वय लग जाता है और उसका यह सरल अर्थ भी हो जाता है कि 'चारों ओर पानी ही पानी होने पर (पीने के लिए कहीं भी बिना प्रयत्न के यथेष्ट पानी मिलने पर) जिस प्रकार कुएँ को कोई भी नहीं पूछता, उसी प्रकार ज्ञान-प्राप्त पुरुष को यज्ञ-याग आदि केवल वैदिक कर्म का कुछ भी उपयोग नहीं रहता।' क्योंकि वैदिककर्म केवल स्वर्ग-प्राप्ति के लिए ही नहीं, बल्कि अन्त में मोक्षसाधक ज्ञान-प्राप्ति के लिए करना होता है, और उस पुरुष को तो ज्ञान-प्राप्ति पहले ही हो जाती है, इस कारण उसे वैदिककर्म करके कोई नई वस्तु पाने के लिए शेष रह नहीं जाती। इसी हेतु से आगे तीसरे अध्याय (3.17) में कहा है, कि 'जो ज्ञानी हो गया, उसे इस जगत में कर्तव्य शेष नहीं रहता।' बड़े भारी तालाब या नदी पर अनायास ही, जितना चाहिए उतना पानी पीने की सुविधा होने पर कुएँ की ओर कौन झाँकेगा? ऐसे समय कोई भी कुएँ की अपेक्षा नहीं रखता। सनत्सुजातीय के अन्तिम अध्याय (मभा॰ उद्योग॰ 45.26) में यही श्लोक कुछ थोड़े से शब्दों के हेरफेर से आया है। माधवाचार्य ने इसकी टीका में वैसा ही अर्थ किया है जैसा कि हमने ऊपर किया है; एवं शुकानुप्रश्न में ज्ञान और कर्म के तारतम्य का विवेचन करते समय साफ कह दिया है – 'न ते (ज्ञानी नः) कर्म प्रशंसन्ति कूपं नद्यां पिबन्निव' – अर्थात् नदी पर जिसे पानी मिलता है, वह जिस प्रकार कुएँ की परवा नहीं करता, उसी प्रकार 'ते' अर्थात् ज्ञानी पुरुष कर्म की कुछ परवा नहीं करते (मभा॰ शां, 240.10)। ऐसे ही पांडवगीता के सत्रहवें श्लोक में कुएँ का दृष्टान्त यों दिया है – जो वासुदेव को छोड़कर दूसरे देवता की उपासना करता है, वह 'तृषितो जाह्नवी तीरे कूपं वाञ्च्छति दुर्मति.' भागीरथी के तट पर पीने के लिए पानी मिलने पर भी कुएँ की इच्छा करनेवाले प्यासे पुरुष के समान मूर्ख है। यह दृष्टान्त केवल वैदिक संस्कृत ग्रन्थों में ही नहीं है, प्रत्युत पाली के बौद्ध ग्रन्थों में भी उसके प्रयोग हैं। यह सिद्धान्त बौद्धधर्म को भी मान्य है कि जिस पुरुष ने अपनी तृष्णा समूल नष्ट कर डाली हो, उसे आगे और कुछ प्राप्त करने के लिए नहीं रह जाता, और इस सिद्धान्त को बतलाते हुए उदान नामक पाली ग्रन्थ के (7.9) उस श्लोक में यह दृष्टान्त दिया है – 'किं कयिरा उदपानेन आपा चे सब्बदा सियुम्' – सर्वदा पानी मिलने योग्य हो जाते से कुएँ को लेकर क्या करना चाहिए? आजकल बड़े-बड़े शहरों में यह देखा ही जाता है कि घर में नल हो जाने से फिर कोई कुएँ की परवा नहीं करता। इससे और विशेष कर शुकानुप्रश्न के विवेचन से गीता के दृष्टान्त का स्वारस्य ज्ञात हो जाएगा और यह देख पड़ेगा कि हमने इस श्लोक का ऊपर जो अर्थ किया है वही सरल और ठीक है। परन्तु, चाहे इस कारण से हो कि ऐसे अर्थ से वेदों को कुछ गौणता आ जाती है, अथवा इस साम्प्रदायिक सिद्धान्त की ओर दृष्टि देने से हो, कि ज्ञान में ही समस्त कर्मों का समावेश रहने के कारण ज्ञानी को कर्म करने की जरूरत नहीं, गीता के टीकाकार इस श्लोक के पदों का अन्वय कुछ निराले ढंग से लगाते है। वे इस श्लोक के पहले चरण में 'तावान्' और दूसरे चरण में 'यावान्' पदों को अध्याहृत मानकर ऐसा अर्थ लगाते है 'उदपाने यावानर्थः तावानेव सर्वतः संप्लुतोदके यथा सम्पद्यते तथा यावान् सर्वेषु वेदेषु अर्थः तावान् विजानतः ब्राह्मणस्य सम्पद्यते' अर्थात् स्नानपान आदि कर्मों के लिए कुएँ का जितना उपयोग होता है, उतना ही बड़े तालाब में (सर्वतः संप्लुतोदके) भी हो सकता है; इसी प्रकार वेदों का जितना उपयोग है, उतना सब ज्ञानी पुरुष को उसके ज्ञान से हो सकता है। परन्तु इस अन्वय में पहली श्लोक-पंक्ति में 'तावान्' और दूसरी पंक्ति में 'यावान्' इन दो पदों के अध्याहार कर लेने की आवश्यकता पड़ने के कारण हमने उस अन्वय और अर्थ को स्वीकृत नहीं किया। हमारा अन्वय और अर्थ किसी भी पद के अध्याहार किए बिना ही लग जाता है और पूर्व के श्लोक से सिद्ध होता है, कि इसमें प्रतिपादित वेदों के कोरे अर्थात् ज्ञानव्यतिरिक्त कर्मकाण्ड का गौणत्व इस स्थल पर विवक्षित है। अब ज्ञानी पुरुष को यज्ञ-याग आदि कर्मों की कोई आवश्यकता न रह जाने से कुछ लोग जो यह अनुमान किया करते है कि इन कर्मों को ज्ञानी पुरुष न करें, बिलकुल छोड़ दे – यह बात गीता को सम्मत नहीं है। क्योंकि यद्यपि इन कर्मों का फल ज्ञानी पुरुष को अभीष्ट नहीं तथापि फल के लिए न सही, तो भी यज्ञ-याग आदि कर्मों को, अपने शास्त्रविहित कर्तव्य समझकर, वह कभी छोड़ नहीं सकता। अठारहवें अध्याय में भगवान् ने अपना निश्चित मत स्पष्ट कह दिया है कि फलाशा न रहे, तो भी अन्यान्य निष्काम-कर्मों के अनुसार यज्ञ-याग आदि कर्म भी ज्ञानी पुरुष को निःसंग बुद्धि से करना चाहिए (पिछले श्लोक पर और गीता 3.19 पर हमारी जो टिप्पणी है उसे देखो)। यहीं निष्काम अर्थ अब अगले श्लोक में व्यक्त कर दिखलाते है –
— Lokmanya Tilak