भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता २.४५ ·

English

मूल श्लोक

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

traiguṇyaviṣayā vedā nistraiguṇyo bhavārjuna nirdvandvo nityasattvastho niryogakṣema ātmavān

२.४५अध्याय २ · साङ्ख्ययोग७२ में से श्लोक ४५

अनुवाद

हे अर्जुन! (कर्मकांडात्मक) वेद (इस रीति से) त्रैगुण्य की बातों से भरे पड़े है, इसलिए तू निस्त्रैगुण्य अर्थात् त्रिगुणों से अतीत, नित्यसत्त्वस्थ और सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों से अलिप्त हो, एवं योग-क्षेम आदि स्वार्थों में न पड़ कर आत्मनिष्ठ।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

सत्त्व, रज और तम इन तीनों गुणों से मिश्रित प्रकृति की सृष्टि को त्रैगुण्य कहते है। सृष्टि सुख-दुःख आदि अथवा जन्म-मरण आदि विनाशवान् द्वन्द्वों से भरी हुई है और सत्य ब्रह्म इसके परे है – यह बात गीतारहस्य ( पृ, 228 और 255) में स्पष्ट कर दिखलाई गई है। इसी अध्याय के 43 वें श्लोक में कहा गया है कि प्रकृति के अर्थात् माया के, इस संसार के सुखों की प्राप्ति के लिए मीमांसक-मार्गवाले लोग श्रौत यज्ञ-याग आदि क्रिया करते है और वे इन्हीं में निमग्न रहा करते है। कोई पुत्र-प्राप्ति के लिए एक विशेष यज्ञ करता है, तो कोई पानी बरसाने के लिए दूसरी इष्टि करता है। ये सब कर्म इस लोक में संसारी व्यवहारों के लिए अर्थात् योग-क्षेम के लिए है। अतएव प्रगट ही है कि जिसे मोक्ष प्राप्त करना हो वह वैदिक कर्मकाण्ड के इन त्रिगुणात्मक और निरे योग-क्षेम सम्पादन करनेवाले कर्मों को छोड़कर अपना चित्त इसके परे परब्रह्म की ओर लगावे। इसी अर्थ में निर्द्वन्द्व और निर्योगक्षेमवान् शब्द – ऊपर आए है। यहाँ ऐसी शंका हो सकती है, कि वैदिक कर्मकाण्ड के इन काम्य कर्मों को छोड़ देने से योग-क्षेम (निर्वाह) कैसे होगा (गीतार॰ पृ. 293 और 384 देखो)? किन्तु इसका उत्तर यहाँ नहीं दिया, यह विषय आग फिर नए अध्याय में आया है। वहाँ कहा गया है कि योग-क्षेम को भगवान करते है; और इन्हीं दो स्थानों पर गीता में 'योग-क्षेम' शब्द आया है। (गी॰ 9.22 और उसपर हमारी टिप्पणी देखो)। नित्यसत्त्वस्थ पद का ही अर्थ त्रिगुणातीत होता है। क्योंकि आगे कहा है, कि सत्त्वगुण के नित्य उत्कर्ष से ही फिर त्रिगुणातीत अवस्था प्राप्त होती है जो कि सच्ची सिद्धावस्था है (गी॰ 14.14 और 20; गी॰ र. पृ. 166 और 167 देखो)। तात्पर्य यह है कि मीमांसकों के योगक्षेमकारक त्रिगुणात्मक काम्य कर्म छोड़कर एवं सुख-दुःख के द्वन्द्वों से निपट कर ब्रह्मनिष्ठ अथवा आत्मनिष्ठ होने के विषय में यहाँ उपदेश किया गया है। किन्तु इस बात पर फिर भी ध्यान देना चाहिए कि आत्मनिष्ठ होने का अर्थ सब कर्मों को स्वरूपतः एकदम छोड़ देना नहीं है। ऊपर के श्लोक में वैदिक काम्य कर्मों की जो निन्दा की गई है, या जो न्यूनता दिखलाई गई है, वह कर्मों की नहीं, बल्कि उन कर्मों के विषय में जो काम्यबुद्धि होती है उसकी है। यदि यह काम्यबुद्धि मन में न हो, तो निरे यज्ञ-याग किसी भी प्रकार से मोक्ष के लिए प्रतिबन्धक नहीं होते (गी॰ र. पृ. 292 – 295)। आगे अठारहवें अध्याय के आरम्भ में भगवान ने अपना निश्चित और उत्तम मत बतलाया है, कि मीमांसकों ने इन्हीं यज्ञ-याग आदि कर्मों को फलाशा और संग छोड़कर चित्त की शुद्धि और लोकसंग्रह के लिए अवश्य करना चाहिए (गी॰ 18.6)। गीता की इन दो स्थानों की बातों को एकत्र करने से यह प्रगट हो जाता है, कि इस अध्याय के श्लोक में मीमांसकों के कर्मकाण्ड की जो न्यूनता दिखलाई गई है, वह उनकी काम्यबुद्धि को उद्देश्य करके है – क्रिया के लिए नहीं है। इसी अभिप्राय को मन में लाकर भागवत में भी कहा है – वेदोक्तमेव कुर्वाणो निःसङ्गोऽर्पितमीश्वरे। नैप्कर्म्यां लभते सिद्धि रोचनार्था फलश्रुतिः॥ 'वेदोक्त कर्मों की वेद में जो फलश्रुति कही है, वह रोचनार्थ है, अर्थात् इसी लिए है कि कर्ता को ये कर्म अच्छे लगें। अतएव इन कर्मों को उस फल-प्राप्ति के लिए न करें, किन्तु निःसंग बुद्धि अर्थात् फल की आशा छोड़कर ईश्वरार्पण बुद्धि से करें। जो पुरुष ऐसा करता है, उसे नैष्कर्म्य से प्राप्त होनेवाली सिद्धि मिलती है।' (भाग॰ 11.3.46)। सारांश, यद्यपि वेदों में कहा है कि अमुक-अमुक कारणों के निमित्त यज्ञ करें, तथापि इसमें न भूलकर केवल इसी लिए यज्ञ करें कि ये यष्टव्य है अर्थात् यज्ञ करना अपना कर्तव्य है; काम्यबुद्धि को तो छोड़ दे, पर यज्ञ को न छोड़े (गी, 17.11); और इसी प्रकार अन्यान्य कर्म भी किया करें – यह गीता के उपदेश का सार है और यही अर्थ अगले श्लोक में व्यक्त किया गया है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय २, श्लोक २.४५