भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता २.४४ ·

English

मूल श्लोक

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयाऽपहृतचेतसाम् ।व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

bhogaiśvaryaprasaktānāṃ tayā'pahṛtacetasām vyavasāyātmikā buddhiḥ samādhau na vidhīyate

२.४४अध्याय २ · साङ्ख्ययोग७२ में से श्लोक ४४

अनुवाद

उल्लिखित भाषण की ओर ही उनके मन आकर्षित हो जाने से भोग और ऐश्वर्य में ही गर्क रहते है; इस कारण उनकी व्यवसायात्मक अर्थात् कार्य-कार्य का निश्चय करने-वाली बुद्धि (कभी भी) समाधिस्थ अर्थात् एक स्थान में स्थिर नहीं रह सकती।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

ऊपर के तीनों श्लोकों का मिल कर एक वाक्य है। उसमें उन ज्ञानविरहित कर्मठ मीमांसामार्ग वालों का वर्णन है, जो श्रौतस्मार्त कर्मकाण्ड के अनुसार आज अमुक हेतु की सिद्धि के लिए तो कल और किसी हेतु से, सदैव स्वार्थ के लिए ही, यज्ञ-याग आदि कर्म में निमग्न रहते हैं। यह वर्णन उपनिषदों के आधार पर किया गया है। उदाहरणार्थ, मुण्डकोपनिषद् में कहा है – इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः। नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वेमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥ 'इष्टापूर्त ही श्रेष्ठ है, दूसरा कुछ भी श्रेष्ठ नहीं – यह मानने वाले मूढ लोग स्वर्ग में पुण्य का उपयोग कर चुकने पर फिर नीचे के इस मनुष्य-लोक में आते है' (मुण्ड॰ 1.210)। ज्ञानविरहित कर्मों की इसी ढँग की निन्दा ईशावस्य और कठ उपनिषदों में भी की गई है (कठ॰ 2.5; ईश॰ 9.12)। परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त न करके केवल कर्मों में ही फँसे रहनेवाले इन लोगों को (देखो गी॰ 9.21) अपने-अपने कर्मों के स्वर्ग आदि फल मिलते तो है, पर उनकी वासना आज एक कर्म में तो कल किसी दूसरे ही कर्म में रत होकर चारों ओर घुड़दौड़ सी मचाये रहती है; इस कारण उन्हें स्वर्ग का आवागमन नसीब हो जाने पर भी मोक्ष नहीं मिलता। मोक्ष की प्राप्ति के लिए बुद्धि-इन्द्रिय को स्थिर या एकाग्र रहना चाहिए। आगे छठे अध्याय में विचार किया गया है कि इसको एकाग्र किस प्रकार करना चाहिए। अभी तो इतना ही कहते है कि –

— Lokmanya Tilak

अध्याय २, श्लोक २.४४