मूल श्लोक
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ।बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
vyavasāyātmikā buddhirekeha kurunandana bahuśākhā hyanantāśca buddhayo'vyavasāyinām
अनुवाद
हे कुरुनन्दन! इस मार्ग में व्यवसाय-बुद्धि अर्थात् कार्य और अकार्य का निश्चय करने वाली (इन्द्रियरूपी) बुद्धि एक अर्थात् एकाग्र रखनी पड़ती है; क्योंकि जिनकी बुद्धि का (इस प्रकार एक) निश्चय नहीं होता, उनकी बुद्धि अर्थात् वासनाएँ अनेक शाखाओं से युक्त और अनन्त (प्रकार की) होती है।
टिप्पणी
संस्कृत में बुद्धि शब्द के अनेक अर्थ हैं। 36 वें श्लोक में यह शब्द ज्ञान के अर्थ में आया है और आगे 49 वें श्लोक में इस 'बुद्धि' शब्द का ही 'समझ, इच्छा, वासना या हेतु' अर्थ है। परन्तु बुद्धि शब्द के पीछे 'व्यवसायात्मिका' विशेषण है इसलिए इस श्लोक के पूर्वार्ध में उसी शब्द का अर्थ यों होता है, व्यवसाय अर्थात् कार्य-अकार्य का निश्चय करने वाली बुद्धि-इन्द्रिय (गीतार॰ प्र॰ 6 पृ.133 – 138 देखो)। पहले इस बुद्धि-इन्द्रिय से किसी भी बात का भला-बुरा विचार कर लेने पर फिर तदनुसार कर्म करने की इच्छा या वासना मन में हुआ करती है; अतएव इस इच्छा या वासना को भी बुद्धि ही कहते है। परन्तु उस समय 'व्यवसायात्मिका' यह विशेषण उसके पीछे नहीं लगाते। भेद दिखलाना ही आवश्यक हो तो, 'वासनात्मक' बुद्धि कहते है। इस श्लोक के दूसरे चरण में सिर्फ 'बुद्धि' शब्द है, उसके पीछे 'व्यवसायात्मक' यह विशेषण नहीं है। इसलिए बहुवचनान्त 'बुद्धयः)' से 'वासना, कल्पनातरंग' अर्थ होकर पूरे श्लोक का यह अर्थ होता है कि 'जिसकी व्यवसायात्मक बुद्धि अर्थात् निश्चय करने वाली बुद्धि-इन्द्रिय स्थिर नहीं होती, उसके मन में क्षण-क्षण में नई तरंगें या वासनाएँ उत्पन्न हुआ करती है।' बुद्धि शब्द के 'निश्चय करने वाली इन्द्रिय' और 'वासना' इन दोनों अर्थों को ध्यान में रखे बिना कर्मयोग की बुद्धि के विवेचन का मर्म भली-भाँति समझ में आने का नहीं। व्यवसायात्मक बुद्धि के स्थिर या एकाग्र न रहने से प्रतिदिन भिन्न-भिन्न वासनाओं से मन व्यग्र हो जाता है और मनुष्य ऐसी अनेक झंझटों में पड़ जाता है कि आज पुत्र-प्राप्ति के लिए अमुक कर्म करो, तो कल स्वर्ग की प्राप्ति के लिए अमुक कर्म करो। बस, अब इसी का वर्णन करते हैं –
— Lokmanya Tilak