मूल श्लोक
एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु ।बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
eṣā te'bhihitā sāṅkhye buddhiryoge tvimāṃ śṛṇu buddhyā yukto yayā pārtha karmabandhaṃ prahāsyasi
अनुवाद
सांख्य अर्थात् संन्यासनिष्ठा के अनुसार तुझे यह बुद्धि अर्थात् ज्ञान या उपपत्ति बतलाई गई। अब जिस बुद्धि से युक्त होने पर (कर्मों के न छोड़ने प भी) हे पार्थ! तू कर्मबन्ध छोड़ेगा, ऐसी यह (कर्म-) योग बुद्धि अर्थात् ज्ञान (तुझ से बतलाता हूँ) सुन।
टिप्पणी
भगवद्गीता का रहस्य समझने के लिए यह श्लोक अत्यन्त महत्त्व का है। सांख्य शब्द से कपिल का सांख्य या निरा वेदान्त, और योग शब्द से पातंजलयोग यहाँ पर उद्दिष्ट नहीं है – सांख्य से संन्यासमार्ग और योग से कर्मयोग ही का अर्थ यहाँ पर लेना चाहिए। यह बात गीता के 3.3 श्लोक से प्रगट होती है। ये दोनों मार्ग स्वतन्त्र है, इनके अनुयायियों को भी क्रम से 'सांख्य' = संन्यासमार्गी और 'योग' = कर्मयोगमार्गी कहते है (गी॰5.5)। इनमें सांख्यनिष्ठा वाले लोग कभी न कभी अन्त में कर्मों को छोड़ देना ही श्रेष्ठ मानते है, इसलिए इस मार्ग के तत्त्वज्ञान से अर्जुन की इस शंका का पूरा-पूरा समाधान नहीं होता कि युद्ध क्यों करें? अतएव जिस कर्मयोगनिष्ठा का ऐसा मत है कि संन्यास ने लेकर ज्ञान-प्राप्ति के पश्चात भी निष्काम बुद्धि से सदैव कर्म करते रहना ही प्रत्येक का सच्चा पुरुषार्थ है, उसी कर्मयोग का (अथवा संक्षेप में योगमार्ग का) ज्ञान बतलाना अब आरम्भ किया गया है, और गीता के अन्तिम अध्याय तक, अनेक कारण दिखलाते हुए, अनेक शंकाओं का निवारण कर, इसी मार्ग का पुष्टीकरण किया गया है। गीता के विषय-निरूपण का, स्वयं भगवान का किया हुआ, यह स्पष्टीकरण ध्यान में रखने से इस विषय में कोई शंका रह नहीं जाती, कि कर्मयोग ही गीता में प्रतिपाद्य है। कर्मयोग के मुख्य-मुख्य सिद्धान्तों के पहले निर्देश करते हैं –
— Lokmanya Tilak