भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता २.३९ ·

English

मूल श्लोक

एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु ।बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

eṣā te'bhihitā sāṅkhye buddhiryoge tvimāṃ śṛṇu buddhyā yukto yayā pārtha karmabandhaṃ prahāsyasi

२.३९अध्याय २ · साङ्ख्ययोग७२ में से श्लोक ३९

अनुवाद

सांख्य अर्थात् संन्यासनिष्ठा के अनुसार तुझे यह बुद्धि अर्थात् ज्ञान या उपपत्ति बतलाई गई। अब जिस बुद्धि से युक्त होने पर (कर्मों के न छोड़ने प भी) हे पार्थ! तू कर्मबन्ध छोड़ेगा, ऐसी यह (कर्म-) योग बुद्धि अर्थात् ज्ञान (तुझ से बतलाता हूँ) सुन।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

भगवद्गीता का रहस्य समझने के लिए यह श्लोक अत्यन्त महत्त्व का है। सांख्य शब्द से कपिल का सांख्य या निरा वेदान्त, और योग शब्द से पातंजलयोग यहाँ पर उद्दिष्ट नहीं है – सांख्य से संन्यासमार्ग और योग से कर्मयोग ही का अर्थ यहाँ पर लेना चाहिए। यह बात गीता के 3.3 श्लोक से प्रगट होती है। ये दोनों मार्ग स्वतन्त्र है, इनके अनुयायियों को भी क्रम से 'सांख्य' = संन्यासमार्गी और 'योग' = कर्मयोगमार्गी कहते है (गी॰5.5)। इनमें सांख्यनिष्ठा वाले लोग कभी न कभी अन्त में कर्मों को छोड़ देना ही श्रेष्ठ मानते है, इसलिए इस मार्ग के तत्त्वज्ञान से अर्जुन की इस शंका का पूरा-पूरा समाधान नहीं होता कि युद्ध क्यों करें? अतएव जिस कर्मयोगनिष्ठा का ऐसा मत है कि संन्यास ने लेकर ज्ञान-प्राप्ति के पश्चात भी निष्काम बुद्धि से सदैव कर्म करते रहना ही प्रत्येक का सच्चा पुरुषार्थ है, उसी कर्मयोग का (अथवा संक्षेप में योगमार्ग का) ज्ञान बतलाना अब आरम्भ किया गया है, और गीता के अन्तिम अध्याय तक, अनेक कारण दिखलाते हुए, अनेक शंकाओं का निवारण कर, इसी मार्ग का पुष्टीकरण किया गया है। गीता के विषय-निरूपण का, स्वयं भगवान का किया हुआ, यह स्पष्टीकरण ध्यान में रखने से इस विषय में कोई शंका रह नहीं जाती, कि कर्मयोग ही गीता में प्रतिपाद्य है। कर्मयोग के मुख्य-मुख्य सिद्धान्तों के पहले निर्देश करते हैं –

— Lokmanya Tilak

अध्याय २, श्लोक २.३९