भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता २.३७ ·

English

मूल श्लोक

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

hato vā prāpsyasi svargaṃ jitvā vā bhokṣyase mahīm tasmāduttiṣṭha kaunteya yuddhāya kṛtaniścayaḥ

२.३७अध्याय २ · साङ्ख्ययोग७२ में से श्लोक ३७

अनुवाद

मर गया तो स्वर्ग को जावेगा और जीत गया तो पृथ्वी (का राज्य) भोगेगा! इसलिए हे अर्जुन! युद्ध का निश्चय करके उठ।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

उल्लिखित विवेचन से न केवल यही सिद्ध हुआ कि सांख्य ज्ञान के अनुसार मरने-मारने का शोक न करना चाहिए, प्रत्युत यह सिद्ध हो गया कि स्वधर्म के अनुसार युद्ध करना ही कर्तव्य है। तो भी अब इस शंका का उत्तर दिया जाता है कि लड़ाई में होनेवाली हत्या का 'पाप' कर्ता को लगता है या नहीं। वास्तव में इस उत्तर की युक्तियाँ कर्मयोगमार्ग की हैं, इसलिए उस मार्ग की प्रस्तावना यहीं हुई है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय २, श्लोक २.३७