भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता २.३१ ·

English

मूल श्लोक

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ।धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

svadharmamapi cāvekṣya na vikampitumarhasi dharmyāddhi yuddhācchreyo'nyatkṣatriyasya na vidyate

२.३१अध्याय २ · साङ्ख्ययोग७२ में से श्लोक ३१

अनुवाद

इसके सिवा स्वधर्म की ओर देखें तो भी (इस समय) हिम्मत हारना तुझे उचित नहीं है। क्योंकि धर्मोचित युद्ध की अपेक्षा क्षत्रिय को श्रेयस्कर और कुछ है ही नहीं।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

स्वधर्म की यह उपपत्ति आगे भी दो बार (गी॰ 3.35 और 18.47) बतलाई गई है। संन्यास अथवा सांख्य-मार्ग के अनुसार यद्यपि कर्मसंन्यास-रूपी चतुर्थ आश्रम अन्त की सीढ़ी है, तो भी मनु आदि स्मृति-कर्ताओं का कथन है कि इसके पहले चातुर्वर्ण्य की व्यवस्था के अनुसार ब्राह्मण को ब्राह्मणधर्म और क्षत्रिय को क्षत्रियधर्म का पालन कर गृहस्थाश्रम पूरा करना चाहिए, अतएव इस श्लोक का आगे के श्लोक का तात्पर्य यह है, कि गृहस्थाश्रमी अर्जुन को युद्ध करना आवश्यक है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय २, श्लोक २.३१