मूल श्लोक
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ।तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
dehī nityamavadhyo'yaṃ dehe sarvasya bhārata tasmātsarvāṇi bhūtāni na tvaṃ śocitumarhasi
अनुवाद
सब के शरीर में (रहनेवाले) शरीर का स्वामी (आत्मा) सर्वदा अवध्य अर्थात् कभी भी वध न किया जाने वाला है; अतएव हे भारत (अर्जुन)! सब अर्थात् किसी भी प्राणी के विषय में शोक करना तुझे उचित नहीं है।
टिप्पणी
अब तक यह सिद्ध किया गया, कि सांख्य या संन्यास-मार्ग के तत्त्वज्ञानानुसार आत्मा अमर है और देह तो स्वभाव से ही अनित्य है, इस कारण कोई मरे या मारे उसमें, 'शोक' करने की कोई आवश्यकता नहीं है। परन्तु यदि कोई इससे यह अनुमान कर ले, कि किसी को मारें तो इसमें भी 'पाप' नहीं तो वह भयंकर भूल होगी। मरना या मारना, इन दो शब्दों के अर्थों का यह पृथक्करण है, मरने या मारने में जो डर लगता है उसे पहले दूर करने के लिए ही वह ज्ञान बतलाया है। मनुष्य तो आत्मा और देह का समुच्चय है। इनमें आत्मा अमर है, इसलिए मरना या मारना ये दोनों शब्द उसे उपयुक्त नहीं होते। बाकी रह गई देह, सो वह तो स्वभाव से ही अनित्य है, यदि उसका नाश हो जाएँ तो शोक करने योग्य कुछ है नहीं। परन्तु यदृच्छा या काल की गति से कोई मर जाएँ या किसी को कोई मार डालें, तो उसका सुख-दुःख न मानकर शोक करना छोड़ दें, तो भी इस प्रश्न का निपटारा हो नहीं जाता, कि युद्ध जैसा घोर कर्म करने के लिए जान-बूझकर प्रवृत्त होकर लोगों के शरीरों का नाश हम क्यों करें। क्योंकि देह यद्यपि अनित्य है, तथापि आत्मा का पक्का कल्याण को मोक्ष सम्पादन कर देने के लिए देह ही तो एक साधन है, अतएव आत्महत्या करना अथवा बिना योग्य कारणों के किसी दूसरे को मार डालना, यो दोनों शास्त्रानुसार घोर पातक ही हैं। इसलिए मरे हुए का शोक करना यद्यपि उचित नहीं है तो भी इसका कुछ न कुछ प्रबल कारण बतलाना आवश्यक है कि एक दूसरे को क्यों मारें। इसी का नाम धर्माधर्म-विवेक है और गीता का वास्तविक प्रतिपाद्य विषय भी यही है। अब, जो चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था सांख्यमार्ग को ही सम्मत है, उसके अनुसार भी युद्ध करना क्षत्रियों का कर्तव्य है, इसलिए भगवान कहते है कि तू मरने-मारने का शोक मत कर; इतना ही नहीं, बल्कि लड़ाई में मरना या मार डालना ये दोनों बातें क्षत्रियधर्मानुसार तुझ को आवश्यक ही हैं –
— Lokmanya Tilak