भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता २.२९ ·

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मूल श्लोक

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ।आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाऽप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

āścaryavatpaśyati kaścidenamāścaryavadvadati tathaiva cānyaḥ āścaryavaccainamanyaḥ śṛṇoti śrutvā'pyenaṃ veda na caiva kaścit

२.२९अध्याय २ · साङ्ख्ययोग७२ में से श्लोक २९

अनुवाद

मानो कोई तो आश्चर्य (अद्भुत वस्तु) समझकर इसकी ओर देखते है, कोई आश्चर्य सरीखा इसका वर्णन करता है, और कोई मानो आश्चर्य समझकर सुनता है। परन्तु (इस प्रकार देखकर, वर्णन कर और) सुनकर भी (इनमें) कोई इसे (तत्त्वतः) नहीं जानता है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

अपूर्व वस्तु समझकर बड़े-बड़े लोग आश्चर्य से आत्मा के विषय में कितना ही विचार क्यों न किया करें, पर उसके सच्चे स्वरूप को जानने वाले बहुत ही थोड़े है। इसी से बहुतेरे लोग मृत्यु के विषय में शोक किया करते हैं। इससे तू ऐसा न करके, पूर्ण विचार से आत्मस्वरूप को यथार्थ रीति पर समझ ले और शोक करना छोड़ दे। इसका यही अर्थ है। कठोपनिषद् (2.7) में आत्मा का वर्णन इसी ढंग का है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय २, श्लोक २.२९