भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता २.२८ ·

English

मूल श्लोक

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

avyaktādīni bhūtāni vyaktamadhyāni bhārata avyaktanidhanānyeva tatra kā paridevanā

२.२८अध्याय २ · साङ्ख्ययोग७२ में से श्लोक २८

अनुवाद

सब भूत आरम्भ में अव्यक्त, मध्य में व्यक्त और मरणसमय में फिर अव्यक्त होते है; (ऐसी यदि सभी की स्थिति है) तो हे भारत! उसमें शोक किस बात का?

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

'अव्यक्त' शब्द का ही अर्थ है - 'इन्द्रियों को गोचरण न होनेवाला।' मूल एक अव्यक्त द्रव्य से ही आगे क्रम-क्रम से समस्त व्यक्त सृष्टि निर्मित होती है, और अन्त में अर्थात् प्रलयकाल में सब व्यक्त सृष्टि का फिर अव्यक्त में ही लय हो जाता है (गी॰ 8.18); इस सांख्यसिद्धान्त का अनुसरण कर इस श्लोक की दलीलें है। सांख्यमत वालों के इस सिद्धान्त का खुलासा गीतारहस्य के सातवें और आठवें प्रकरण में किया गया है। किसी भी पदार्थ की व्यक्त स्थिति यदि इस प्रकार कभी न कभी नष्ट होनेवाली है, तो जो व्यक्त स्वरूप निसर्ग से ही नाशवान है, उसके विषय में शोक करने की कोई आवश्यकता ही नहीं। यही श्लोक 'अव्यक्त' के बदले 'अभाव' शब्द से संयुक्त होकर महाभारत के स्त्रीपर्व (मभा॰ स्त्री.26) में आया है। आगे 'अदर्शनादापतिताः पुनश्चादर्शनं गताः। न ते तव न तेषां त्वं तत्र का परिदेवना॥' (स्त्री. 2.13) इस श्लोक में 'अदर्शन' अर्थात् 'नजर से दूर हो जाना' इस शब्द का भी मृत्यु को उद्देश्य कर उपयोग किया गया है। सांख्य और वेदान्त, दोनों शास्त्रों के अनुसार शोक करना यदि व्यर्थ सिद्ध होता है, और आत्मा को अनित्य मानने से भी यदि यही बात सिद्ध होती है, तो फिर लोग मृत्यु के विषय में शोक क्यों करते है? आत्मस्वरूप सम्बन्धी अज्ञान ही इसका उत्तर है। क्योंकि –

— Lokmanya Tilak

अध्याय २, श्लोक २.२८