भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता २.२५ ·

English

मूल श्लोक

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ।तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

avyakto'yamacintyo'yamavikāryo'yamucyate tasmādevaṃ viditvainaṃ nānuśocitumarhasi

२.२५अध्याय २ · साङ्ख्ययोग७२ में से श्लोक २५

अनुवाद

इस आत्मा को ही अव्यक्त (अर्थात् जो इन्द्रियों को गोचर नहीं हो सकता), अचिन्त्य (अर्थात् जो मन से भी जाना नहीं जा सकता), और अविकार्य (अर्थात् जिसे किसी भी विकार की उपाधि नहीं है) कहते है। इसलिए उसे (आत्मा को) इस प्रकार का समझ कर उसका शोक करना तुझे उचित नहीं है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

यह वर्णन उपनिषदों से लिया गया है। यह वर्णन निर्गुण आत्मा का है, सगुण का नहीं। क्योंकि अविकार्य या अचिन्य विशेषण सगुण को लग नहीं सकते (गीतारहस्य प्र॰ 9 देखो)। आत्मा के विषय में वेदान्तशास्त्र का जा अन्तिम सिद्धान्त है, उसके आधार से शोक न करने के लिए यह उपपत्ति बतलाई गई है। अब कदाचित् कोई ऐसा पूर्वपक्ष करें, कि हम आत्मा को नित्य नहीं समझते, इसलिए तुम्हारी उपपत्ति हमें ग्राह्य नहीं, तो इस पूर्वपक्ष का प्रथम उल्लेख करके भगवान उसका उत्तर देते है, कि –

— Lokmanya Tilak

अध्याय २, श्लोक २.२५