भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता २.१८ ·

English

मूल श्लोक

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

antavanta ime dehā nityasyoktāḥ śarīriṇaḥ anāśino'prameyasya tasmādyudhyasva bhārata

२.१८अध्याय २ · साङ्ख्ययोग७२ में से श्लोक १८

अनुवाद

कहा है कि जो शरीर का स्वामी (आत्मा) नित्य, अविनाशी और अचिन्त्य है, उसे प्राप्त होनेवाले ये शरीर नाशवान् अर्थात् अनित्य है। अतएव हे भारत! तू युद्ध कर।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

सारांश, इस प्रकार नित्य-अनित्य का विवेक करने से तो यह भाव ही झूठा होता है कि 'मैं अमुक को मारता हूँ,' और युद्ध न करने के लिए अर्जुन ने जो कारण दिखलाया था, वह निर्मूल होता है। इसी अर्थ को अब और अधिक स्पष्ट करते है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय २, श्लोक २.१८