मूल श्लोक
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
antavanta ime dehā nityasyoktāḥ śarīriṇaḥ anāśino'prameyasya tasmādyudhyasva bhārata
अनुवाद
कहा है कि जो शरीर का स्वामी (आत्मा) नित्य, अविनाशी और अचिन्त्य है, उसे प्राप्त होनेवाले ये शरीर नाशवान् अर्थात् अनित्य है। अतएव हे भारत! तू युद्ध कर।
टिप्पणी
सारांश, इस प्रकार नित्य-अनित्य का विवेक करने से तो यह भाव ही झूठा होता है कि 'मैं अमुक को मारता हूँ,' और युद्ध न करने के लिए अर्जुन ने जो कारण दिखलाया था, वह निर्मूल होता है। इसी अर्थ को अब और अधिक स्पष्ट करते है –
— Lokmanya Tilak