मूल श्लोक
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
ya enaṃ vetti hantāraṃ yaścainaṃ manyate hatam ubhau tau na vijānīto nāyaṃ hanti na hanyate
अनुवाद
(शरीर के स्वामी या आत्मा) को ही जो मारने वाला मानता है या ऐसा समझता है कि वह मारा जाता है, उन दोनों को ही सच्चा ज्ञान नहीं है (क्योंकि ) यह (आत्मा) न तो मारता है और न मारा ही जाता है।
टिप्पणी
क्योंकि यह आत्मा नित्य और स्वयं अकर्ता है, खेल तो सब प्रकृति का ही है। कठोपनिषद् में यह और अगला श्लोक आया है (कठ॰ 2.18.19)। इसके अतिरिक्त महाभारत के अन्य स्थानों में भी ऐसा वर्णन है, कि काल से सब ग्रसे हुए है, इस काल की क्रीड़ा को यह 'मारने और मरने' की लौकि क संज्ञाएँ हैं (शां॰ 25.15)। गीता (11.33) में भी आगे भक्तिमार्ग की भाषा से यही तत्त्व भगवान् ने अर्जुन को फिर बतलाया है, कि भीष्म-द्रोण आदि को कालस्वरूप से मैंने ही पहले मार डाला है, तू केवल निमित्त हो जा।
— Lokmanya Tilak