मूल श्लोक
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
avināśi tu tadviddhi yena sarvamidaṃ tatam vināśamavyayasyāsya na kaścitkartumarhati
अनुवाद
स्मरण रहे कि यह (जगत्) जिसने फैलाया अथवा व्याप्त किया है, वह (मूल आत्मस्वरूप ब्रह्म) अविनाशी है। इस अव्यय तत्त्व का विनाश करने के लिए कोई भी समर्थ नहीं है।
टिप्पणी
पिछले श्लोक में जिसे सत् कहा है; उसी का यह वर्णन है। यह बतला दिया गया है कि शरीर का स्वामी अर्थात् आत्मा ही 'नित्य' श्रेणी में आता है। अब यह बतलाते है कि अनित्य या असत् किसे कहना चाहिए –
— Lokmanya Tilak