भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता २.१६ ·

English

मूल श्लोक

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

nāsato vidyate bhāvo nābhāvo vidyate sataḥ ubhayorapi dṛṣṭo'ntastvanayostattvadarśibhiḥ

२.१६अध्याय २ · साङ्ख्ययोग७२ में से श्लोक १६

अनुवाद

जो नहीं (असत्) है वह हो ही नहीं सकता, और जो है (सत्) उसका अभाव नहीं होता; तत्त्वज्ञानी पुरुषों ने 'सत् और असत्' दोनों का अन्त देख लिया है अर्थात् अन्त देखकर उनके स्वरूप का निर्णय किया है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

इस श्लोक के 'अन्त' शब्द का अर्थ और 'राद्धान्त,' 'सिद्धान्त' एवं 'कृतान्त' शब्दों (गी॰18.13) के 'अन्त' का अर्थ एक ही है। शाश्वतकोश (351) में 'अन्त' शब्द के ये अर्थ है – 'स्वरूपप्रान्तयोरन्तमन्ति केऽपि प्रयुज्यते।' इस श्लोक में सत् का अर्थ ब्रह्म और असत् का अर्थ नाम-रूपात्मक दृश्य जगत है (गी॰ र॰ प्र॰ 9 पृ. 223 – 224 और 243 – 245 देखो)। स्मरण रहे कि 'जो है, उसका अभाव नहीं होता' इत्यादि तत्त्व देखने में यद्यपि सत्कार्य वाद के समान देख पड़े, तो भी उनका अर्थ कुछ निराला है। जहाँ एक वस्तु से दूसरा वस्तु निर्मित होती है – उदाहरण बीज से वृक्ष – वहाँ सत्कार्य-वाद का तत्त्व उपयुक्त होता है। प्रस्तुत श्लोक में इस प्रकार का प्रश्न नहीं है; वक्तव्य इतना ही है कि सत् अर्थात् जो है, उसका अस्तित्व (भाव) और असत् अर्थात् जो नहीं है उसका अभाव, ये दोनों नित्य यानी सदैव कायम रहनेवाले है। इस प्रकार क्रम से दोनो के भाव-अभाव को नित्य मान ले तो आगे फिर आप ही आप कहना पड़ता है, कि जो 'सत्' है उसका नाश होकर उसका 'असत्' नहीं हो जाता। परन्तु यह अनुमान, और सत्कार्य वाद में पहले ही ग्रहण की हुए एक वस्तु से दूसरी वस्तु की कार्य-कारणरूप उत्पत्ति, ये दोनों एक सी नहीं है (गीतार॰ प्र॰ 7 पृ. 156 देखो)। माध्वभाष्य में इस श्लोक के 'नासतो विद्यते भावः' इस पहले चरण के 'विद्यते भावः' का 'विद्यते + अभाव' ऐसा पदच्छेद है और उसका अर्थ किया है कि असत् यानी अव्यक्त प्रकृति का अभाव, अर्थात् नाश नहीं होता है। और जब कि दूसरे चरण में यह कहा है कि सत् का भी नाश नहीं होता, तब अपने द्वैती सम्प्रदाय के अनुसार मध्वाचार्य ने इस श्लोक का ऐसा अर्थ किया है कि सत् और असत् दोनों नित्य हैं! परन्तु यह अर्थ सरल नहीं है; इसमें खींचातानी है। क्योंकि स्वाभाविक रीति से देख पड़ता है, कि परस्पर-विरोधी असत् और सत् शब्दों के समान ही अभाव और भाव ये विरोधी शब्द भी इस स्थल पर प्रयुक्त है; एवं दूसरे चरण में अर्थात् 'नाभावो विद्यते सतः' यहाँ पर नाभावों में यदि अभाव शब्द ही लेना पड़ता है, तो प्रगट है कि पहले में भाव शब्द ही रहना चाहिए। इसके अतिरिक्त यह कहने के लिए, कि असत् और सत् ये दोनों नित्य हैं, 'अभाव' और 'विद्यते' इन पदों के दो बार प्रयोग करने की कोई आवश्यकता न थी। किन्तु मध्वाचार्य के कथनानुसार यदि इस द्विरुक्ति को आदरार्थ मान भी लें, तो आगे अठारहवें श्लोक में कहा गया है, कि व्यक्त या दृश्य सृष्टि में आने वाले मनुष्य का शरीर नाशवान अर्थात् अनित्य है। अतएव आत्मा के साथ ही साथ भगवद्गीता के अनुसार, देह को भी नित्य नहीं मान सकते प्रगट रूप से सिद्ध होता है, कि एक नित्य है और दूसरा अनित्य। पाठकों को यह दिखलाने के लिए कि साम्प्रदायिक दृष्टि से कैसी खींचातानी की जाती है, हमने नमूने के ढँग पर यहाँ इस श्लोक का माध्वभाष्यवाला अर्थ लिख दिया है। अस्तु; जो सत् है वह कभी नष्ट होने का नहीं, अतएव सत्स्वरूपी आत्मा का शोक न करना चाहिए; और तत्त्व की दृष्टि से नामरूपात्मक देह आदि अथवा सुख-दुःख आदि विकार मूल में ही विनाशी है, इसलिए उनके नाश होने का शोक करना भी उचित नहीं। फलतः आरम्भ में अर्जुन से जो यह कहा गया है, कि 'जिसका शोक न करना चाहिए, उसका तू शोक कर रहा है' यह सिद्ध हो गया। अब 'सत्' और 'असत्' के अर्थों को ही अगले दो श्लोकों में और भी स्पष्ट कर बतलाते हैं –

— Lokmanya Tilak

अध्याय २, श्लोक २.१६