भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता २.१५ ·

English

मूल श्लोक

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

yaṃ hi na vyathayantyete puruṣaṃ puruṣarṣabha samaduḥkhasukhaṃ dhīraṃ so'mṛtatvāya kalpate

२.१५अध्याय २ · साङ्ख्ययोग७२ में से श्लोक १५

अनुवाद

क्योंकि हे नरश्रेष्ठ! सुख और दुःख को समान मानने वाले जिस ज्ञानी पुरुष को उनकी व्यथा नहीं होती, वही अमृतत्त्व अर्थात् अमृत ब्रह्म की स्थिति को प्राप्त कर लेने में समर्थ होता है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

जिस पुरुष को ब्रह्मात्मैक्य नहीं हुआ और इसीलिए जिसे नाम-रूपात्मक जगत मिथ्या नहीं जान पड़ा है, वह बाह्य पदार्थों और इन्द्रियों के संयोग से होनेवाले शीत-उष्ण आदि या सुख-दुःख आदि विकारों को सत्य मानकर, आत्मा में उनका अध्यारोप किया करता है, और इस कारण से उसको दुःख की पीड़ा होती है। परन्तु जिसने यह जान लिया है कि ये सभी विकार प्रकृति के हैं, आत्मा अकर्ता और अलिप्त है, उसे सुख और दुःख एक ही से हैं। अब अर्जुन से भगवान यह कहते है कि इस समबुद्धि से तू उनको सहन कर। और यही अर्थ अगले अध्याय में अधिक विस्तार से वर्णित है। शांकरभाष्य में 'मात्रा' शब्द का अर्थ इस प्रकार किया गया है - 'मीयते एभिरिति मात्राः' अर्थात् जिनसे बाहरी पदार्थ मापे जाते है या ज्ञात होते है, इन्हें इन्द्रियाँ कहते है। पर मात्रा का इन्द्रिय अर्थ न करके, कुछ लोग ऐसा भी अर्थ करते है कि इन्द्रियों में मापे जाने वाले शब्द-रूप आदि बाह्य पदार्थों को मात्रा कहते है और उनका इन्द्रियों के जो स्पर्श अर्थात् संयोग होता है, उसे मात्रास्पर्श कहते है। इसी अर्थ को हमने स्वीकृत किया है। क्योंकि इस श्लोक के विचार गीता में आगे जहाँ पर आए है (गीता॰ 5.21 – 23) वहाँ 'बाह्य-स्पर्श' शब्द है; और 'मात्रास्पर्श' शब्द का हमारे किए हुए अर्थ के समान अर्थ करने से, इन दोनों शब्दों का अर्थ एक ही सा हो जाता है। तथापि इस प्रकार ये दोनों शब्द मिलते-जुलते है, तो भी मात्रास्पर्श शब्द पुराना देख पड़ता है। क्योंकि मनुस्मृति (6.56) में, इसी अर्थ में, मात्रासङ्ग शब्द आया है, और बृहदारण्यकोपनिषद् में वर्णन है, कि मरने पर ज्ञानी पुरुष के आत्मा का मात्राओं से असंसर्ग (मात्राऽसंसर्गः) होता है अर्थात् वह मुक्त हो जाता है और उसे संज्ञा नहीं रहती (बृ॰ माध्यं॰ 4.5.14; वे॰ सू॰ शांभा॰ 1.4.22)। शीतोष्ण और सुख-दुःख पद उपलक्षणात्मक है; इनमें राग-द्वेष, सत्-असत् और मृत्यु-अमरत्व इत्यादि परस्पर-विरुद्ध द्वन्द्वों का समावेश होता है। ये सब माया-सृष्टि के द्वन्द्व हैं। इसलिए प्रगट है कि अनित्य माया-सृष्टि के इन द्वन्द्वों को शान्तिपूर्वक सहकर, इन द्वन्द्वों से बुद्धि को छुड़ाये बिना, ब्रह्म-प्राप्ति नहीं होती (गी॰2.45, 7.28 और गी॰ र. पृ. 9, पृ 22 और 244 देखो)। अब अध्यात्मशास्त्र की दृष्टि से इसी अर्थ को व्यक्त कर दिखलाते है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय २, श्लोक २.१५