भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता २.१२ ·

English

मूल श्लोक

न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

na tvevāhaṃ jātu nāsaṃ na tvaṃ neme janādhipāḥ na caiva na bhaviṣyāmaḥ sarve vayamataḥ param

२.१२अध्याय २ · साङ्ख्ययोग७२ में से श्लोक १२

अनुवाद

देखो न, ऐसा तो है ही नहीं कि मैं (पहले) कभी न था; तू और ये राजा लोग (पहले) न थे, और ऐसा भी नहीं हो सकता कि हम सब लोक अब आगे न होंगे।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

इस श्लोक पर रामानुजभाष्य में जो टीका है, उसमें लिखा है – श्लोक से ऐसा सिद्ध होता है कि 'मैं' अर्थात् परमेश्वर और 'तू एवं राजा लोग' अर्थात् अन्यान्य आत्मा, दोनों यदि पहले (अतीतकाल में) थे और आगे होनेवाले हैं, तो परमेश्वर और आत्मा, दोनों ही पृथक स्वतन्त्र और नित्य है। किन्तु यह अनुमान ठीक नहीं है, साम्प्रदायिक आग्रह है। क्योंकि इस स्थान पर प्रतिपाद्य इतना ही है कि सभी नित्य है; उनका पारस्परिक सम्बन्ध यहाँ बतलाया नहीं है और बतलाने की कोई आवश्यकता भी न थी। जहाँ वैसा प्रसंग आया है, वहाँ गीता में ही ऐसा अद्वैत सिद्धान्त (गी॰ 8.4, 13.31) स्पष्ट रीति से बतला दिया है कि समस्त प्राणियों के शरीरों में देहधारी आत्मा मैं अर्थात् एक ही परमेश्वर हूँ।

— Lokmanya Tilak

अध्याय २, श्लोक २.१२