मूल श्लोक
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
tamuvāca hṛṣīkeśaḥ prahasanniva bhārata senayorubhayormadhye viṣīdantamidaṃ vacaḥ
अनुवाद
(फिर) हे भारत (धृतराष्ट्र)! दोनों सेनाओं के बीच खिन्न होकर बैठे हुए अर्जुन से श्रीकृष्ण कुछ हँसते हुए से बोले।
टिप्पणी
एक ओर तो क्षत्रिय का स्वधर्म और दूसरी ओर गुरुहत्या एवं कुलक्षय के पातकों का भय – इस खींचातानी में 'मरें या मारे' के झमेले में पड़कर, भिक्षा माँगने के लिए तैयार हो जाने वाले अर्जुन को अब भगवान इस जगत में उसके सच्चे कर्तव्य का उपदेश करते है। अर्जुन की शंका थी कि लड़ाई जैसे कर्म से आत्मा का कल्याण न होगा। इसी से, जिन उदार पुरुषों ने परब्रह्म का ज्ञान प्राप्त कर अपनी आत्मा का पूर्ण कल्याण कर लिया है, वे इस दुनिया मे कैसा बर्ताव करते हैं, यहीं से गीता के उपदेश का आरम्भ हुआ है। भगवान कहते है कि संसार की चाल-ढाल के परखने से देख पड़ता है कि आत्मज्ञानी पुरुषों के जीवन बिताने के अनादिकाल से दो मार्ग चले आ रहे हैं (गी॰ 3.3 और गीता रहस्य पृ. 11 देखो।) आत्मज्ञान सम्पादन करने पर शुक सरीखे पुरुष संसार छोड़कर आनन्द से भिक्षा माँगते फिरते है, जो जनक सरीखे दूसरे आत्मज्ञानी ज्ञान के पश्चात भी स्वधर्मानुसार लोगों के कल्याणार्थ संसार के सैकड़ों व्यवहारों में अपना समय लगाया करते है। पहले मार्ग को सांख्य या सांख्यनिष्ठा कहते है और दूसरे को कर्मयोग या योग कहते है (श्लोक 39 देखो)। यद्यपि दोनों निष्ठाएँ प्रचलित है, तथापि इनमें कर्मयोग ही अधिक श्रेष्ठ है – गीता का यह सिद्धान्त आगे बतलाया जावेगा (गी॰ 5.2)। इन दोनों निष्ठाओं में से अब अर्जुन के मन की चाह संन्यासनिष्ठा की ओर ही अधिक बढ़ी हुई थी। अतएव उसी मार्ग के तत्त्वज्ञान से पहले अर्जुन की भूल उसे सुझा दी गई है; और आगे 39 वें श्लोक से कर्मयोग का प्रतिपादन करना भगवान ने आरम्भ कर दिया है। सांख्यमार्ग वाले पुरुष ज्ञान के पश्चात कर्म भले ही न करते हों, पर उनका ब्रह्मज्ञान और कर्मयोग का ब्रह्मज्ञान कुछ जुदा-जुदा नहीं। तब सांख्यनिष्ठा के अनुसार देखने पर भी आत्मा यदि अविनाशी और नित्य है, तो फिर यह बकबक व्यर्थ है कि 'मैं अमुक को कैसे मारूँ?' इस प्रकार निश्चित उपहासपूर्वक अर्जुन से भगवान का प्रथम कथन है।
— Lokmanya Tilak