मूल श्लोक
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद् गुह्यमहं परम् ।योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
vyāsaprasādācchrutavānetad guhyamahaṃ param yogaṃ yogeśvarātkṛṣṇātsākṣātkathayataḥ svayam
अनुवाद
व्यासजी के अनुग्रह से मैंने यह परम गुह्य, यानी योग अर्थात् कर्मयोग, साक्षात् योगेश्वर स्वयं श्रीकृष्ण ही के मुख से सुना है।
टिप्पणी
पहले ही लिख आए है, कि व्यास ने संजय को दिव्य दृष्टि दी थी, जिससे रणभूमि पर होनेवाली सारी घटनाएँ उसे घर बैठे ही दिखाई देती थीं। और उन्हीं का वृत्तान्त वह धृतराष्ट्र से निवेदन कर देता था। श्रीकृष्ण ने जिस 'योग' का प्रतिपादन किया, वह कर्मयोग है (गी॰ 4.1 – 3) और अर्जुन ने पहले उसे 'योग' (साम्ययोग) कहा है (गी॰ 6.33); तथा अब संजय भी श्रीकृष्णार्जुन के संवाद को इस श्लोक में 'योग' ही कहता है। इससे स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण, अर्जुन और सञ्जय, तीनों के मतानुसार 'योग' अर्थात् कर्मयोग ही गीता का प्रतिपाद्य विषय है। और अध्याय-समाप्ति-सूचक संकल्प में भी वही, अर्थात् योगशास्त्र, शब्द आया है। परन्तु योगेश्वर शब्द में 'योग' शब्द का अर्थ इससे कहीं अधिक व्यापक है। योग का साधारण अर्थ कर्म करने की युक्ति , कुशलता या शैली है। उसी अर्थ के अनुसार कहा जाता है कि बहुरुपिया योग से अर्थात् कुशलता से अपने स्वाँग बना लाता है। परन्तु जब कर्म करने की युक्तियों में श्रेष्ठ युक्ति को खोजते हैं, तब कहना पड़ता है कि जिस युक्ति से परमेश्वर मूल में अव्यक्त होने पर भी वह अपने आप को व्यक्त स्वरूप देता है, वही युक्ति अथवा योग सब में श्रेष्ठ है। गीता में इसी को 'ईश्वरी योग' (गी॰ 9.5; 11.8) कहा है; और वेदान्त में जिसे माया कहते है, वह भी वही है (गी॰ 7.25)। यह अलौ कि क अथवा अघटित योग जिसे साध्य हो जाएँ उसे अन्य सब युक्तियाँ तो हाथ का मैल हैं। परमेश्वर इन योगों का अथवा माया का अधिपति है: अतएव उसे योगेश्वर अर्थात् योगों का स्वामी कहते है। 'योगेश्वर' शब्द में योग का अर्थ पातंजल-योग नहीं है।
— Lokmanya Tilak