भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १८.७३ ·

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मूल श्लोक

अर्जुन उवाच ।नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाऽच्युत ।स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

arjuna uvāca naṣṭo mohaḥ smṛtirlabdhā tvatprasādānmayā'cyuta sthito'smi gatasandehaḥ kariṣye vacanaṃ tava

१८.७३अध्याय १८ · मोक्षसंन्यासयोग७८ में से श्लोक ७३

अनुवाद

अर्जुन ने कहा: हे पार्थ! तुम्हारे प्रसाद से मेरा मोह नष्ट हो गया; और मुझे (कर्तव्य-धर्म की) स्मृति हो गई। मैं (अब) निःसन्देह हो गया हूँ। आपके उपदेशानुसार (युद्ध) करूँगा।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

जिनकी साम्प्रदायिक समझ यह है, कि गीताधर्म में भी संसार को छोड़ देने का उपदेश किया गया है, उन्होंने इस अन्तिम अर्थात् 73 वें श्लोक की बहुत कुछ निराधार खींचातानी की है। यदि विचार किया जाएँ, कि अर्जुन को किस बात की विस्मृति हो गई थी, तो पता लगेगा कि दूसरे अध्याय (2.7) में उसने कहा है कि 'अपना धर्म अथवा कर्तव्य समझने में मेरा मन असमर्थ हो गया है' (धर्मसम्मूढचेताः) अतः उक्त श्लोक का सरल अर्थ यही है, कि उसी भूले हुए) कर्तव्य-धर्म की अब उसे स्मृति हो आई है। अर्जुन को युद्ध में प्रवृत्त करने के लिए गीता का उपदेश किया गया है, और स्थान-स्थान पर ये शब्द कहे गए है कि 'इसलिए तू युद्ध कर' (गी॰ 2.18; 2.37; 3.30; 8.7; 11 34); अतएव इस 'आपके आज्ञानुसार करूँगा' पद का अर्थ 'युद्ध करता हूँ' ही होता है। अस्तु; श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद समाप्त हुआ। अब महाभारत की कथा के संदर्भानुसार संजय धृतराष्ट्र को यह कथा सुना कर उपसंहार करता है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय १८, श्लोक १८.७३