मूल श्लोक
श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः ।सोऽपि मुक्तः शुभांल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
śraddhāvānanasūyaśca śṛṇuyādapi yo naraḥ so'pi muktaḥ śubhāṃllokānprāpnuyātpuṇyakarmaṇām
अनुवाद
इसी प्रकार दोष न ढूँढ कर श्रद्धा के साथ जो इसे सुनेगा, वह भी (पापों से) मुक्त होकर उन शुभ लोकों में जा पहुँचेगा कि जो पुण्यवान लोगों को मिलते है।
टिप्पणी
यहाँ उपदेश समाप्त हो चुका। अब यह जाँचने के लिए, कि यह धर्म अर्जुन की समझ में ठीक-ठीक आ गया है या नहीं, भगवान उससे पूछते है–
— Lokmanya Tilak