भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १८.५७ ·

English

मूल श्लोक

चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः ।बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

cetasā sarvakarmāṇi mayi saṃnyasya matparaḥ buddhiyogamupāśritya maccittaḥ satataṃ bhava

१८.५७अध्याय १८ · मोक्षसंन्यासयोग७८ में से श्लोक ५७

अनुवाद

मन से सब कर्मों को मुझमें 'संन्यस्य' अर्थात् समर्पित करके मत्परायण होता हुआ (साम्य) बुद्धियोग के आश्रय से हमेशा मुझमें चित्त रख।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

बुद्धियोग शब्द दूसरे ही अध्याय (2.49) में आ चुका है, और वहाँ उसका अर्थ फलाशा में बुद्धि न रख कर कर्म करने की युक्ति अथवा समत्वबुद्धि है। यही अर्थ यहाँ भी विवक्षित है। दूसरे अध्याय में जो यह कहा था, कि कर्म की अपेक्षा बुद्धि श्रेष्ठ है, उसी सिद्धान्त का यह उपसंहार है। इसी में कर्म-संन्यास का अर्थ भी इन शब्दों के द्वारा व्यक्त किया गया है कि 'मन से (अर्थात् कर्म का प्रत्यक्ष त्याग न करके, केवल बुद्धि से) मुझमें सब कर्म समर्पित कर।' और, वही अर्थ पहले गीता 3.20 एवं 5.13 में भी वर्णित है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय १८, श्लोक १८.५७