भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १८.५६ ·

English

मूल श्लोक

सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः ।मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

sarvakarmāṇyapi sadā kurvāṇo madvyapāśrayaḥ matprasādādavāpnoti śāśvataṃ padamavyayam

१८.५६अध्याय १८ · मोक्षसंन्यासयोग७८ में से श्लोक ५६

अनुवाद

और मेरा ही आश्रय कर, सब कर्म करते रहने पर भी उसे अनुग्रह से शाश्वत एवं अव्यय स्थान प्राप्त होता है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

ध्यान रहे कि सिद्धावस्था का उक्त वर्णन कर्मयोगियों का है – कर्मसंन्यास करनेवाले पुरुषों का नहीं। आरम्भ में ही 45 वें और 49 वें श्लोक में कहा है, कि उक्त वर्णन आसक्ति छोड़ कर कर्म करनेवालों का है, तथा अन्त के 56 वें श्लोक में 'सब कर्म करते रहने पर भी' शब्द आए हैं उक्त वर्णन भक्तों के अथवा त्रिगुणातीतों के वर्णन के ही समान है; यहाँ तक कि कुछ शब्द भी उसी वर्णन से लिए गए है। उदाहरणार्थ, 53 वें श्लोक का 'परिग्रह' शब्द छठवें अध्याय (6.10) में योगी के वर्णन में आया है; 54 वें श्लोक का 'न शोचति न कांक्षति' पद बारहवें अध्याय (12.17) में भक्तिमार्ग के वर्णन में है; और विविक्त (अर्थात् चुने हुए, एकान्त स्थल में रहना) शब्द 13 वें अध्याय के 10 वें श्लोक में आ चुका है। कर्मयोगी को प्राप्त होनेवाली उपर्युक्त अन्तिम स्थिति और कर्म-संन्यासमार्ग से प्राप्त होनेवाली अन्तिम स्थिति दोनों केवल मानसिक दृष्ट से एक ही हैं; इसी से संन्यासमार्गीय टीकाकारों को यह कहने का अवसर मिल गया है, कि उक्त वर्णन हमारे ही मार्ग का है। परन्तु हम कई बार कह चुके है, कि यह सच्चा अर्थ नहीं है। अस्तु, इस अध्याय के आरम्भ में प्रतिपादन किया गया है, कि संन्यास का अर्थ कर्म-त्याग नहीं है, किन्तु फलाशा के त्याग को ही संन्यास कहते है। जब संन्यास शब्द का इस प्रकार अर्थ हो चुका, तब यह सिद्ध है कि यज्ञ, दान आदि कर्म चाहे काम्य हों, चाहे नित्य हो या नैमित्तिक, उनको अन्य सब कर्मों के समान के कर्म, कर्ता, बुद्धि आदि सम्पूर्ण विषयों की गुण-भेद से अनेकता दिखला कर उनमें सात्त्विक को श्रेष्ठ कहा है; और गीताशास्त्र का इत्यर्थ यह बतलाया है, कि चातुर्वर्ण्यव्यवस्था के द्वारा स्वधर्मानुसार प्राप्त होनेवाले समस्त कर्मों को आसक्ति छोड़कर करते जाना ही परमेश्वर का यजन-पूजन करना है; एवं क्रमशः इसी से अन्त में परब्रह्म अथवा मोक्ष की प्राप्ति होती है – मोक्ष के लिए कोई दूसरा अनुष्ठान करने की आवश्यकता नहीं है अथवा कर्मत्यागरूपी संन्यास लेने की भी जरूरत नहीं है; केवल इस कर्मयोग से ही मोक्ष-सहित सब सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। अब इसी कर्मयोगमार्ग को स्वीकार कर लेने के लिए अर्जुन को फिर एक बार अन्तिम उपदेश करते है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय १८, श्लोक १८.५६