मूल श्लोक
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṃsiddhiṃ labhate naraḥ svakarmanirataḥ siddhiṃ yathā vindati tacchṛṇu
अनुवाद
अपने-अपने (स्वभावजन्य गुणों के अनुसार प्राप्त होनेवाले) कर्मों में नित्य रत (रहनेवाला) पुरुष (उसी से) परम सिद्धि पाता है। सुनो, अपने काम में तत्पर रहने से सिद्धि कैसे मिलती है।