भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १८.४४ ·

English

मूल श्लोक

कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

kṛṣigaurakṣyavāṇijyaṃ vaiśyakarma svabhāvajam paricaryātmakaṃ karma śūdrasyāpi svabhāvajam

१८.४४अध्याय १८ · मोक्षसंन्यासयोग७८ में से श्लोक ४४

अनुवाद

कृषि अर्थात् खेती, गोरक्षा यानी पशुओं को पालने का उद्यम और वाणिज्य अर्थात् व्यापार वैश्यों का स्वभावजन्य कर्म है। और, इसी प्रकार सेवा करना शूद्रों का स्वाभाविक कर्म है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था स्वभावजन्य गुण-भेद से निर्मित हुई है; यह न समझा जाएँ, कि यह उपपत्ति पहले पहल गीता में ही बतलाई गई है। किन्तु महाभारत के वनपर्वान्तर्गत नहुष-युधिष्ठिर-संवाद में और द्विज-व्याध संवाद (वन॰ 180 और 211) में, शान्तिपर्व के भृगु-भारद्वाज-संवाद (शां॰ 188) में अनुशासनपर्व के उमा-महेश्वर-संवाद (अनु॰ 143) में और अश्वमेधपर्व (39.11) की अनुगीता में गुण-भेद की यही उपपत्ति कुछ अन्तर से पाई जाती है। यह पहले ही कहा जा चुका है, कि जगत के विविध व्यवहार प्रकृति के गुण-भेद से हो रहे हैं; फिर सिद्ध किया गया है कि मनुष्य का यह कर्तव्य-कर्म, कि किसे क्या करना चाहिए, जिस चातुर्वर्ण्य व्यवस्था से नियत किया जाता है, वह व्यवस्था भी प्रकृति के गुणभेद का परिणाम है। अब यह प्रतिपादन करते है, कि उक्त कर्म हरएक मनुष्य को निष्काम बुद्धि से अर्थात् परमेश्वरार्पण बुद्धि से करना चाहिए, अन्यथा जगत का कारबार नहीं चल सकता; तथा मनुष्य के आचरण से ही सिद्धि प्राप्त हो जाती है, सिद्धि पाने के लिए और कोई दूसरा अनुष्ठान करने की आवश्यकता नहीं है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय १८, श्लोक १८.४४