मूल श्लोक
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
yataḥ pravṛttirbhūtānāṃ yena sarvamidaṃ tatam svakarmaṇā tamabhyarcya siddhiṃ vindati mānavaḥ
अनुवाद
प्राणिमात्र की जिससे प्रवृत्ति हुई है, और जिसने सारे जगत का विस्तार किया है अथवा जिससे सब जगत व्याप्त है, उसकी अपने (स्वधर्मानुसार प्राप्त होनेवाले) कर्मों के द्वारा (केवल वाणी अथवा फूलों से ही नहीं) पूजा करने से मनुष्य को सिद्धि प्राप्त होती है।
टिप्पणी
इस प्रकार प्रतिपादन किया गया, कि चातुर्वर्ण्य के अनुसार प्राप्त होनेवाले कर्मों को निष्काम-बुद्धि से अथवा परमेश्वरार्पण-बुद्धि से करना विराट-स्वरूपी परमेश्वर का एक प्रकार का यजन-पूजन ही है, तथा इसी से सिद्धि मिल जाती है (गीतार॰ पृ. 436 – 437)। अब उक्त गुण-भेदानुसार स्वभावतः प्राप्त होनेवाला कर्तव्य किसी दूसरी दृष्टि से सदोष, अश्लाध्य, कठिन अथवा अप्रिय भी हो सकता है; उदाहरणार्थ, इस अवसर पर क्षत्रियधर्म के अनुसार युद्ध करने में हत्या होने के कारण वह सदोष दिखाई देगा। तो ऐसे समय पर मनुष्य को क्या करना चाहिए? क्या वह स्वधर्म को छोड़ कर, अन्य धर्म स्वीकार कर ले (गी॰ 3.35); या कुछ भी हो, स्वकर्म को ही करता जावें; यदि स्वकर्म ही करना चाहिए तो कैसे करें – इत्यादि प्रश्नों का उत्तर उसी न्याय के अनुरोध से बतलाया जाता है, कि जो इस अध्याय में प्रथम (18.6) यज्ञ-याग आदि कर्मों के सम्बन्ध में कहा गया है –
— Lokmanya Tilak