मूल श्लोक
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप ।कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
brāhmaṇakṣatriyaviśāṃ śūdrāṇāṃ ca parantapa karmāṇi pravibhaktāni svabhāvaprabhavairguṇaiḥ
अनुवाद
हे परन्तप! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के कर्म उनके स्वभावजन्य अर्थात् प्रकृति-सिद्धि गुणों के अनुसार पृथक-पृथक बँटे हुए हैं।