भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १८.४० ·

English

मूल श्लोक

न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

na tadasti pṛthivyāṃ vā divi deveṣu vā punaḥ sattvaṃ prakṛtijairmuktaṃ yadebhiḥ syāttribhirguṇaiḥ

१८.४०अध्याय १८ · मोक्षसंन्यासयोग७८ में से श्लोक ४०

अनुवाद

इस पृथ्वी पर, आकाश में अथवा देवताओं में अर्थात् देवलोक में भी ऐसी कोई वस्तु नहीं, कि जो प्रकृति के इन तीन गुणों से मुक्त हो।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

अठारहवें श्लोक से यहाँ तक ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख के भेद बतला कर अर्जुन की आँखों के सामने इस बात का एक चित्र रख दिया है कि सम्पूर्ण जगत में प्रकृति के गुण-भेद से विचित्रता कैसे उत्पन्न होती है; तथा फिर यह प्रतिपादन किया है, कि इन सब भेदों में सात्त्विक भेद श्रेष्ठ और ग्राह्य है। इन सात्त्विक भेदों में भी सब से श्रेष्ठ स्थिति है उसी को गीता में त्रिगुणातीत अवस्था कहा है। गीतारहस्य के सातवें प्रकरण (पृ. 167 – 168) में हम कह चुके है, कि त्रिगुणातीत अथवा निर्गुण अवस्था गीता के अनुसार कोई स्वतन्त्र या चौथा भेद नहीं है। इसी न्याय के अनुसार मनुस्मृति में भी सात्त्विक गति के ही उत्तम, मध्यम और कनिष्ठ तीन भेद करके कहा गया है, कि उत्तम सात्त्विक गति मोक्षप्रद और मध्यम सात्त्विक गति स्वर्गप्रद है (मनु॰ 12.48 – 50 और 89 – 91 देखो)। जगत में जो प्रकृति है उसकी विचित्रता का यहाँ तक वर्णन किया गया। अब इस गुण-विभाग से ही चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था की उत्पत्ति का निरूपण किया जाता है। यह बात पहले कई बार कही जा चुकी है कि (देखो 18.7 – 9 और 3.8) स्वधर्मानुसार प्रत्येक मनुष्य को अपना-अपना 'नियत' अर्थात् नियुक्त किया हुआ कर्म फलाशा छोड़ कर, परन्तु धृति, उत्साह और सारासार विचार के साथ-साथ, करते जाना ही कर्तव्य है। परन्तु जिस बात से कर्म 'नियत' होता है, उसकी बीज अब तक कहीं भी नहीं बतलाया गया। पीछे एक बार चातुर्वर्ण्यव्यवस्था का कुछ थोड़ा सा उल्लेख कर (4.13) कहा गया है, कि कर्तव्यअकर्तव्य का निर्णय शास्त्र के अनुसार करना चाहिए (गी॰ 16.24)। परन्तु जगत के व्यवहार को किसी नियमानुसार जारी रखने के हेतु (देखो गीतार॰ पृ. 334, 397 और 495 – 496) जिस गुण-कर्मविभाग के तत्त्व पर चातुर्वर्ण्यरूपी शास्त्रव्यवस्था निर्मित की गई है, उसका पूर्ण स्पष्टीकरण उस स्थान में नहीं किया गया। अतएव जिस संस्था से समाज में हर एक मनुष्य का कर्तव्य नियत होता है, अर्थात् स्थिर किया जाता है, उस चातुर्वर्ण्य की, गुणत्रय-विभाग के अनुसार, उपपत्ति के साथ ही साथ अब प्रत्येक वर्ण के नियत किए हुए कर्तव्य भी कहे जाते हैं–

— Lokmanya Tilak

अध्याय १८, श्लोक १८.४०