मूल श्लोक
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् ।तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
yattadagre viṣamiva pariṇāme'mṛtopamam tatsukhaṃ sāttvikaṃ proktamātmabuddhiprasādajam
अनुवाद
जो आरम्भ में (तो) विष के समान जान पड़ता है, परन्तु परिणाम में अमृत के तुल्य है, जो आत्मनिष्ठ-बुद्धि की प्रसन्नता से प्राप्त होता है, उस (आध्यात्मिक) सुख को सात्त्विक कहते है।