मूल श्लोक
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् ।परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
viṣayendriyasaṃyogādyattadagre'mṛtopamam pariṇāme viṣamiva tatsukhaṃ rājasaṃ smṛtam
अनुवाद
इन्द्रियों और उनके विषयों के संयोग से होनेवाला (अर्थात् आधिभौतिक) सुख राजस कहा जाता है, कि जो पहले तो अमृत के समान है पर अन्त में विष सा रहता है।