मूल श्लोक
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ ।अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
sukhaṃ tvidānīṃ trividhaṃ śṛṇu me bharatarṣabha abhyāsādramate yatra duḥkhāntaṃ ca nigacchati
अनुवाद
अब हे भरतश्रेष्ठ! मैं सुख के भी तीन भेद बतलाता हूँ; सुन। अभ्यास से अर्थात् निरन्तर परिचय से (मनुष्य) जिसमें रम जाता है और जहाँ दुःख का अन्त होता है,