भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १८.३५ ·

English

मूल श्लोक

यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ।न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

yayā svapnaṃ bhayaṃ śokaṃ viṣādaṃ madameva ca na vimuñcati durmedhā dhṛtiḥ sā pārtha tāmasī

१८.३५अध्याय १८ · मोक्षसंन्यासयोग७८ में से श्लोक ३५

अनुवाद

हे पार्थ! जिस धृति से मनुष्य दुर्बुद्धि होकर निद्रा, भय, शोक, विषाद और मद नहीं छोड़ता, वह धृति तामस है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

'धृति' शब्द का अर्थ धैर्य है; परन्तु यहाँ पर शारीरिक धैर्य से अभिप्राय नहीं है। इस प्रकरण में धृति शब्द का अर्थ मन का दृढ़ निश्चय है। निर्णय करना बुद्धि का काम है सही; परन्तु इस बात की भी आवश्यकता है, कि बुद्धि जो योग्य निर्णय करें, वह सदैव स्थिर रहे। बुद्धि के निर्णय को ऐसा स्थिर या दृढ़ करना मन का धर्म है; अतएव कहना चाहिए कि धृति अथवा मानसिक धैर्य का गुण मन और बुद्धि दोनों की सहायता से उत्पन्न होता है। परन्तु इतना ही कह देने से सात्त्विक धृति का लक्षण पूर्ण नहीं हो जाता, कि अव्यभिचारी अर्थात् इधर उधर विचलित न होनेवाले धैर्य के बल पर मन, प्राण और इन्द्रियों के व्यापार करना चाहिए। बल्कि यह भी बतलाना चाहिए, कि ये व्यापार किस वस्तु पर होते है अथवा इन व्यापारों का कर्म क्या है। वह 'कर्म'-योग शब्द से सूचित किया गया है। अतः 'योग' शब्द का अर्थ केवल 'एकाग्र' चित्त कर देने से काम नहीं चलता। इसी लिए हमने इस शब्द का अर्थ, पूर्वापर सन्दर्भ के अनुसार, कर्मफल-त्यागरूपी योग किया है। सात्त्विक कर्म के और सात्त्विक कर्ता आदि के लक्षण बतलाते समय जैसे 'फल की आसक्ति छोड़ने' को प्रधान गुण माना है, वैसे ही सात्त्विक धृति का लक्षण बतलाने में भी उसी को प्रधान मानना चाहिए। इसके सिवा अगले ही श्लोक में यह वर्णन है, कि राजस धृति फलाकांक्षी होती है, अतः इस श्लोक से यह वर्णन है, कि सात्त्विक धृति, राजस धृति के विपरीत, अफलाकांक्षी होनी चाहिए। तात्पर्य यह है, कि निश्चय की दृढ़ता तो निरी मानसिक क्रिया है, उसके भली या बुरी होने का विचार करने के अर्थ यह देखना चाहिए, कि जिस कार्य के लिए उस क्रिया का उपयोग किया जाता है, वह कार्य कैसी है। नींद और आलस्य आदि कामों में ही दृढ़निश्चय किया गया हो तो वह तामस है; और फलाशात्यागरूपी योग में वह दृढ़ निश्चय किया गया हो तो सात्त्विक है। इस प्रकार ये धृति के भेद हुए; अब बतलाते हैं, कि गुण-भेदानुसार सुख के तीन प्रकार कैसे होते है–

— Lokmanya Tilak

अध्याय १८, श्लोक १८.३५