भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १८.३ ·

English

मूल श्लोक

त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

tyājyaṃ doṣavadityeke karma prāhurmanīṣiṇaḥ yajñadānatapaḥ karma na tyājyamiti cāpare

१८.३अध्याय १८ · मोक्षसंन्यासयोग७८ में से श्लोक ३

अनुवाद

कुछ पंडितों का कथन है, कि कर्म दोषयुक्त है अतएव उसका (सर्वथा) त्याग करना चाहिए; तथा दूसरे कहते है कि यज्ञ, दान, तप और कर्म को कभी न छोड़ना चाहिए।

— Lokmanya Tilak

अध्याय १८, श्लोक १८.३