भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १८.२ ·

English

मूल श्लोक

श्रीभगवानुवाच ।काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः ।सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

śrībhagavānuvāca kāmyānāṃ karmaṇāṃ nyāsaṃ saṃnyāsaṃ kavayo viduḥ sarvakarmaphalatyāgaṃ prāhustyāgaṃ vicakṣaṇāḥ

१८.२अध्याय १८ · मोक्षसंन्यासयोग७८ में से श्लोक २

अनुवाद

श्रीभगवान ने कहा: (जितने) काम्य कर्म हैं, उनके न्यास अर्थात् छोड़ने को ज्ञानी लोग संन्यास समझते हैं (तथा) समस्त कर्मों के फलों के त्याग को पण्डित लोग त्याग कहते हैं।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

इस श्लोक में स्पष्टता बतला दिया है, कि कर्मयोग-मार्ग में संन्यास और त्याग किसे कहते हैं। परन्तु संन्यासमार्गीय टीकाकारों को यह मत ग्राह्य नहीं; इस कारण उन्होंने इस श्लोक की बहुत खींचातानी की है। श्लोक में प्रथम ही 'काम्य' शब्द आया है, अतएव इन टीकाकारों का मत है कि यहाँ मीमांसकों के नित्य, नैमित्तिक, काम्य और निषिद्ध प्रभृति कर्मभेद विवक्षित है और उनकी समझ में भगवान का अभिप्राय यह है, कि उनमें से केवल काम्य'कर्मों ही को छोड़ना चाहिए।' परन्तु संन्यासमार्गीय लोगों को नित्य और नैमित्तिक कर्म भी नहीं चाहिए, इसलिए उन्हें यों प्रतिपादित करना पड़ा है कि यहाँ नित्य और नैमित्तिक कर्मों का काम्य कर्मों में ही समावेश किया गया है। इतना करने पर भी इस श्लोक के उत्तरार्ध में जो कहा गया है, कि फलाशा छोड़ना चाहिए न कि कर्म (आगे छठा श्लोक देखिए), उसका मेल मिलता ही नहीं; अतएव अन्त में इन टीकाकारों ने अपने ही मन से यों कहकर समाधान कर लिया है कि भगवान ने यहाँ कर्मयोग-मार्ग की कोरी स्तुति की है; उनका सच्चा अभिप्राय तो यही है कि कर्मों को छोड़ ही देना चाहिए! इससे स्पष्ट होता है कि संन्यास आदि सम्प्रदायों की दृष्टि से इस श्लोक का अर्थ ठीक-ठीक नहीं लगता। वास्तव में इसका अर्थ कर्मयोगप्रधान ही करना चाहिए, अर्थात् फलाशा छोड़ कर मरण-पर्यन्त सारे कर्म करते जाने का जो तत्त्व गीता में पहले अनेक बार कहा गया है, उसी के अनुरोध से यहाँ भी अर्थ करना चाहिए; तथा यही अर्थ सरल है और ठीक-ठीक जमता भी है। पहले इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि 'काम्य' शब्द से इस स्थान में मीमांसकों का नित्य, नैमित्तिक, काम्य और निषिद्ध कर्मविभाग अभिप्रेत नहीं है। कर्मयोगमार्ग में सब कर्मों के दो ही विभाग किए जाते है; एक 'काम्य' अर्थात् फलाशा से किए हुए कर्म और दूसरे 'निष्काम' अर्थात् फलाशा छोड़कर किए हुए कर्म। मनुस्मृति में इन्हीं को क्रम से 'प्रवृत्त' कर्म और 'निवृत्त' कर्म कहा है (देखो मनु॰ 12.88 और 89)। कर्म चाहे नित्य हों, नैमित्तिक हों, काम्य हो, कायिक हों, वाचिक हों, मानसिक हों, अथवा सात्विक आदि भेद के अनुसार और किसी प्रकार के हों, उन सब को 'काम्य' अथवा 'निष्काम' इन दो में से किसी एक विभाग में आना ही चाहिए। क्योंकि काम अर्थात् फलाशा का होना, अथवा न होना, इन दोनों के अतिरिक्त फलाशा की दृष्टि से तीसरा भेद हो ही नहीं सकता। शास्त्र में जिस कर्म का जो फल कहा गया है – जैसे पुत्रप्राप्ति के लिए पुत्रेष्ठि – उस फल की इच्छा न रखकर वही कर्म केवल कर्तव्य समझकर किया जाएँ तो वह 'निष्काम' हो जाता है। इस प्रकार सब कर्मों के 'काम्य' और 'निष्काम' (अथवा मनु की परिभाषा के अनुसार प्रवृत्त और निवृत्त) यही दो भेद सिद्ध होते है। अब कर्मयोगी में भी काम्य कर्म का संन्यास करना पड़ता है। फिर बच रहे निष्काम कर्म; सो गीता में कर्मयोग को निष्काम कर्म करने का निश्चित उपदेश किया गया है सही, उसमें भी 'फलाशा' का सर्वथा त्याग करना पड़ता है (गी॰ 6.2)। अतएव त्याग का तत्त्व भी गीताधर्म में स्थिर ही रहता है। तात्पर्य यह है कि सब कर्मों को न छोड़ने पर भी कर्मयोगमार्ग में संन्यास और 'त्याग' दोनों तत्त्व बने रहते है। अर्जुन को यही बात समझा देने के लिए इस श्लोक में संन्यास और त्याग दोनों की व्याख्या यों की गई है कि 'संन्यास' का अर्थ 'काम्य कर्मों को सर्वथा छोड़ देना' है और 'त्याग' का यह मतलब है कि 'जो कर्म करना हो उनकी फलाशा न रखे।' पीछे जब यह प्रतिपादित हो रहा था कि संन्यास (अथवा सांख्य) और योग दोनों तत्त्वतः एक ही है तब 'संन्यासी' शब्द का अर्थ भी (गी॰ 5.3 – 6 और 6.1 – 2 देखो) इसी भाँति किया गया है और इसी अध्याय में आगे 'त्यागी' शब्द का अर्थ भी (गी॰18.11) में इसी भाँति किया गया है और इस स्थान में वही अर्थ इष्ट है। यहाँ स्मार्तों का यह मत प्रतिपाद्य नहीं है कि क्रमशः ब्रह्मचर्य, गृहस्थाश्रम और वानप्रस्थ आश्रम का पालन करने पर 'अन्त में प्रत्येक मनुष्य को सर्वत्यागरूपी संन्यास अथवा चतुर्थाश्रम लिए बिना मोक्ष-प्राप्ति हो ही नहीं सकती।' इससे सिद्ध होता है कि कर्मयोगी यद्यपि संन्यासियों की गेरुआ भेष धारण कर सब कर्मों का त्याग नहीं करता, तथापि वह संन्यास के सच्चे-सच्चे तत्त्व का पालन किया करता है, इसलिए कर्मयोग का स्मृतिग्रन्थ से कोई विरोध नहीं होता। अब संन्यासयोग और मीमांसकों के कर्म-सम्बन्धी वाद का उल्लेख करके कर्मयोगशास्त्र का, इस विषय में, अन्तिम निर्णय सुनाते है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय १८, श्लोक १८.२