मूल श्लोक
अर्जुन उवाच ।संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
arjuna uvāca saṃnyāsasya mahābāho tattvamicchāmi veditum tyāgasya ca hṛṣīkeśa pṛthakkeśiniṣūdana
अनुवाद
अर्जुन ने कहा: हे महाबाहु, हृषीकेश! मैं संन्यास का तत्त्व, और हे केशिदैत्य-निषूदन त्याग का तत्त्व पृथक-पृथक जानना चाहता हूँ।
टिप्पणी
संन्यास और त्याग शब्दों के उन अर्थों अथवा भेदों को जानने के लिए यह प्रश्न नहीं किया गया है, कि जो कोशकारों ने किए है। यह न समझना चाहिए कि अर्जुन यह भी न जानता था कि दोनों का धात्वर्थ 'छोड़ना' है। परन्तु बात यह है कि भगवान कर्म छोड़ देने की आज्ञा कहीं भी नहीं देते, बल्कि चौथे, पाँचवें अथवा छठवें अध्याय (4.41, 5.13, 6.10) में या अन्यत्र जहाँ कहीं भी संन्यास का वर्णन है वहाँ, उन्होंने यही कहा है कि केवल फलाशा का 'त्याग' करके (गी॰12.11) सब कर्मों का 'संन्यास' करो अर्थात् सब कर्म परमेश्वर को समर्पण करो (3.30, 12.6)। और, उपनिषदों में देखें तो कर्मत्याग प्रधान संन्यास-धर्म के यह वचन पाए जाते है, कि 'न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानुशः' (कै॰1.2, नारायण 12.3)। - सब कर्मों का स्वरूपतः 'त्याग' करने से ही कई एकों मोक्ष प्राप्त किया है, अथवा 'वेदान्तविज्ञान सुनिश्चि तार्थाः संन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वाः' (मुंडक॰ 3.2.6) - कर्मत्यागरूपी 'संन्यास' योग से शुद्ध होनेवाले 'यति' या 'किं प्रजया करिष्यामः' (बृ॰ 4.4.22) – हमें पुत्रपौत्र आदि प्रजा से क्या काम है? अतएव अर्जुन ने समझा कि भगवान स्मृतिग्रन्थों में प्रतिपादित चार आश्रमों में से कर्म-त्यागरूपी संन्यास आश्रम के लिए 'त्याग' और 'संन्यास' शब्दों का उपयोग नहीं करते, किन्तु वे और किसी अर्थ में उन शब्दों का उपयोग करते है। इसी से अर्जुन ने चाहा कि उस अर्थ का पूर्ण स्पष्टीकरण हो जाएँ। इसी हेतु से उसने उक्त प्रश्न किया है। गीतारहस्य के ग्यारहवें प्रकरण (पृ. 346 – 349) मे इस विषय का विस्तारपूर्वक विवेचन किया गया है।
— Lokmanya Tilak