भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १८.१५ ·

English

मूल श्लोक

शरीरवाङ्‌मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः ।न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

śarīravāṅmanobhiryatkarma prārabhate naraḥ nyāyyaṃ vā viparītaṃ vā pañcaite tasya hetavaḥ

१८.१५अध्याय १८ · मोक्षसंन्यासयोग७८ में से श्लोक १५

अनुवाद

शरीर से, वाणी से, अथवा मन से मनुष्य जो जो कर्म करता है – फिर चाहे वह न्याय्य हो या विपरीत अर्थात् अन्याय्य – उसके उक्त पाँच कारण हैं।

— Lokmanya Tilak

अध्याय १८, श्लोक १८.१५