मूल श्लोक
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
adhiṣṭhānaṃ tathā kartā karaṇaṃ ca pṛthagvidham vividhāśca pṛthakceṣṭā daivaṃ caivātra pañcamam
अनुवाद
अनिष्ठान (स्थान), तथा कर्ता, भिन्न-भिन्न करण यानी साधन, (कर्ता की) अनेक प्रकार की पृथक-पृथक चेष्टाएँ अर्थात् व्यापार, और उसके साथ ही साथ पाँचवाँ (कारण) दैव है।