भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १७.९ ·

English

मूल श्लोक

कट्‌वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

kaṭvamlalavaṇātyuṣṇatīkṣṇarūkṣavidāhinaḥ āhārā rājasasyeṣṭā duḥkhaśokāmayapradāḥ

१७.९अध्याय १७ · श्रद्धात्रयविभागयोग२८ में से श्लोक ९

अनुवाद

कटु अर्थात् चरपरे, खट्टे, खारे, अत्युष्ण, तीखे, रूखे, दाहकारक तथा दुःख-शोक और रोग उपजाने वाले आहार राजस मनुष्य को प्रिय होते है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

संस्कृत में कटु शब्द का अर्थ चरपरा और तिक्त का अर्थ कडुवा होता है। इसी के अनुसार संस्कृत के वैद्यक ग्रन्थों में काली मिरच कटु और नींब तिक्त कही गई है (देखो वाग्भट सूत्र॰ अ॰ 10)। हिन्दी में कडुए और तीखे शब्द क्रमानुसार कटु और तिक्त शब्दों के ही अपभ्रंश हैं।

— Lokmanya Tilak

अध्याय १७, श्लोक १७.९