मूल श्लोक
आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ।रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
āyuḥsattvabalārogyasukhaprītivivardhanāḥ rasyāḥ snigdhāḥ sthirā hṛdyā āhārāḥ sāttvikapriyāḥ
अनुवाद
आयु, सात्त्विक वृत्ति, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति की वृद्धि करनेवाले, रसीले स्निग्ध, शरीर में भिद कर चिरकाल तक रहनेवाले और मन को आनन्ददायक आहार सात्त्विक मनुष्य को प्रिय होते हैं।