मूल श्लोक
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
yātayāmaṃ gatarasaṃ pūti paryuṣitaṃ ca yat ucchiṣṭamapi cāmedhyaṃ bhojanaṃ tāmasapriyam
अनुवाद
कुछ काल रखा हुआ अर्थात् ठंडा, नीरस, दुर्गन्धि त, बासा, जूँठा तथा अपवित्र भोजन तामस पुरुष को रुचता है।
टिप्पणी
सात्त्विक मनुष्य को सात्त्विक, राजस को राजस तथा तामस को तामस भोजन प्रिय होता है। इतना ही नहीं, यदि आहार शुद्ध अर्थात् सात्त्विक हो, तो मनुष्य की वृत्ति भी क्रम क्रम से शुद्ध या सात्त्विक हो सकती है। उपनिषदों में कहा है कि 'आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धि' (छां॰ 7.26.2)। क्योंकि मन और बुद्धि प्रकृति के विकार है, इसलिए जहाँ सात्त्विक आहार हुआ वहाँ बुद्धि भी आप ही आप सात्त्विक बन जाती है। ये आहार के भेद हुए। इसी प्रकार अब यज्ञ के तीन भेदों का भी वर्णन करते है–
— Lokmanya Tilak