भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १७.१० ·

English

मूल श्लोक

यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

yātayāmaṃ gatarasaṃ pūti paryuṣitaṃ ca yat ucchiṣṭamapi cāmedhyaṃ bhojanaṃ tāmasapriyam

१७.१०अध्याय १७ · श्रद्धात्रयविभागयोग२८ में से श्लोक १०

अनुवाद

कुछ काल रखा हुआ अर्थात् ठंडा, नीरस, दुर्गन्धि त, बासा, जूँठा तथा अपवित्र भोजन तामस पुरुष को रुचता है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

सात्त्विक मनुष्य को सात्त्विक, राजस को राजस तथा तामस को तामस भोजन प्रिय होता है। इतना ही नहीं, यदि आहार शुद्ध अर्थात् सात्त्विक हो, तो मनुष्य की वृत्ति भी क्रम क्रम से शुद्ध या सात्त्विक हो सकती है। उपनिषदों में कहा है कि 'आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धि' (छां॰ 7.26.2)। क्योंकि मन और बुद्धि प्रकृति के विकार है, इसलिए जहाँ सात्त्विक आहार हुआ वहाँ बुद्धि भी आप ही आप सात्त्विक बन जाती है। ये आहार के भेद हुए। इसी प्रकार अब यज्ञ के तीन भेदों का भी वर्णन करते है–

— Lokmanya Tilak

अध्याय १७, श्लोक १७.१०