भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १७.६ ·

English

मूल श्लोक

कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

karśayantaḥ śarīrasthaṃ bhūtagrāmamacetasaḥ māṃ caivāntaḥśarīrasthaṃ tānviddhyāsuraniścayān

१७.६अध्याय १७ · श्रद्धात्रयविभागयोग२८ में से श्लोक ६

अनुवाद

तथा जो न केवल शरीर के पंचमहाभूतों के समूह को ही, वरन् शरीर के अन्तर्गत रहनेवाले मुझको भी कष्ट देते है, उन्हें अविवेकी आसुरी बुद्धि के जानो।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

इस प्रकार अर्जुन के प्रश्नों के उत्तर हुए। इन श्लोकों का भावार्थ यह है, कि मनुष्य की श्रद्धा उसके प्रकृति-स्वभाव सात्त्विक, राजस अथवा तामस होती है, और उसके अनुसार उसके कर्मों में अन्तर होता है तथा उन कर्मों के अनुरूप ही उसे पृथक-पृथक गति प्राप्त होती है। परन्तु केवल इतने से ही कोई आसुरी कक्षा में लेख नहीं लिया जाता। अपनी स्वाधीनता का उपयोग कर और शास्त्रानुसार आचरण करके प्रकृति-स्वभाव को धीरे-धीरे सुधारते जाना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है। हाँ, जो ऐसा नहीं करते और दुष्ट प्रकृति-स्वभाव का ही अभिमान रख कर शास्त्र के विरुद्ध आचरण करते है, उन्हें आसुरी बुद्धि के कहना चाहिए, यह इन श्लोकों का भावार्थ है। अब यह वर्णन किया जाता है कि श्रद्धा के समान ही आहार, यज्ञ, तप और दान के सत्त्व-रज-तममय प्रकृति के गुणों से भिन्न-भिन्न भेद कैसे हो जाते है; एवं इन भेदों से स्वभाव की विभिन्नता के साथ ही साथ क्रिया की विचित्रता भी कैसे उत्पन्न होती है–

— Lokmanya Tilak

अध्याय १७, श्लोक १७.६