मूल श्लोक
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः ।प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
yajante sāttvikā devānyakṣarakṣāṃsi rājasāḥ pretānbhūtagaṇāṃścānye yajante tāmasā janāḥ
अनुवाद
जो पुरुष सात्त्विक है अर्थात् जिनका स्वभाव सत्त्वगुण-प्रधान है वे देवताओं का यजन करते हैं; राजस पुरुष यक्षों और राक्षसों का यजन करते हैं, एवं इसके अतिरिक्त जो तामस पुरुष हैं, वे प्रेतों और भूतों का यजन करते हैं।
टिप्पणी
इस प्रकार शास्त्र पर श्रद्धा रखने वाले मनुष्यों के भी सत्त्व आदि प्रकृति के गुण-भेदों से जो तीन भेद होते है, उनका और उनके स्वरूपों का वर्णन हुआ। अब बतलाते है, कि शास्त्र पर श्रद्धा न रखने वाले काम-परायण और दाम्भिक लोग किस श्रेणी में आते है। यह तो स्पष्ट है कि ये लोग सात्त्विक नहीं हैं, परन्तु ये निरे तामस भी नहीं कहे जा सकते; क्योंकि यद्यपि इनके कर्म शास्त्र-विरुद्ध होते हैं, तथापि इनमें कर्म करने की प्रवृत्ति होती है और यह रजोगुण का धर्म है। तात्पर्य यह है, कि ऐसे मनुष्यों को न सात्त्विक कह सकते हैं, न राजस और न तामस। अतएव दैवी और आसुरी नामक दो कक्षाएँ बना कर उक्त दुष्ट पुरुषों को आसुरी कक्षा में समावेश किया जाता है। यही अर्थ अगले दो श्लोकों में स्पष्ट किया गया है।
— Lokmanya Tilak