भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १७.४ ·

English

मूल श्लोक

यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः ।प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

yajante sāttvikā devānyakṣarakṣāṃsi rājasāḥ pretānbhūtagaṇāṃścānye yajante tāmasā janāḥ

१७.४अध्याय १७ · श्रद्धात्रयविभागयोग२८ में से श्लोक ४

अनुवाद

जो पुरुष सात्त्विक है अर्थात् जिनका स्वभाव सत्त्वगुण-प्रधान है वे देवताओं का यजन करते हैं; राजस पुरुष यक्षों और राक्षसों का यजन करते हैं, एवं इसके अतिरिक्त जो तामस पुरुष हैं, वे प्रेतों और भूतों का यजन करते हैं।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

इस प्रकार शास्त्र पर श्रद्धा रखने वाले मनुष्यों के भी सत्त्व आदि प्रकृति के गुण-भेदों से जो तीन भेद होते है, उनका और उनके स्वरूपों का वर्णन हुआ। अब बतलाते है, कि शास्त्र पर श्रद्धा न रखने वाले काम-परायण और दाम्भिक लोग किस श्रेणी में आते है। यह तो स्पष्ट है कि ये लोग सात्त्विक नहीं हैं, परन्तु ये निरे तामस भी नहीं कहे जा सकते; क्योंकि यद्यपि इनके कर्म शास्त्र-विरुद्ध होते हैं, तथापि इनमें कर्म करने की प्रवृत्ति होती है और यह रजोगुण का धर्म है। तात्पर्य यह है, कि ऐसे मनुष्यों को न सात्त्विक कह सकते हैं, न राजस और न तामस। अतएव दैवी और आसुरी नामक दो कक्षाएँ बना कर उक्त दुष्ट पुरुषों को आसुरी कक्षा में समावेश किया जाता है। यही अर्थ अगले दो श्लोकों में स्पष्ट किया गया है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय १७, श्लोक १७.४