मूल श्लोक
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
sattvānurūpā sarvasya śraddhā bhavati bhārata śraddhāmayo'yaṃ puruṣo yo yacchraddhaḥ sa eva saḥ
अनुवाद
हे भारत! सब लोगों की श्रद्धा अपने-अपने सत्त्व के अनुसार अर्थात् प्रकृतिस्वभाव के अनुसार होती है। मनुष्य श्रद्धामय है। जिसकी जैसी श्रद्धा रहती है, वह वैसा ही होता है।
टिप्पणी
दूसरे श्लोक में 'सत्त्व' शब्द का अर्थ देहस्वभाव, बुद्धि अथवा अन्तःकरण है। उपनिषद में 'सत्त्व' शब्द इसी अर्थ में आया है (कठ॰6.7) और वेदान्तसूत्र के शांकरभाष्य में भी 'क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ' पद के स्थान में 'सत्त्वक्षेत्रज्ञ' पद का उपयोग किया गया है (वे॰ सू॰ शांभा॰ 1.2.12)। तात्पर्य यह है, कि दूसरे श्लोक का 'स्वभाव' शब्द और तीसरे श्लोक का 'सत्त्व' शब्द यहाँ दोनों ही समानार्थक हैं। क्योंकि सांख्य और वेदान्त दोनों को ही यह सिद्धान्त मान्य है, कि स्वभाव का अर्थ प्रकृति है; इस प्रकृति से बुद्धि एवं अन्तःकरण उत्पन्न होते है। 'यो यच्छ्रद्धः स एव सः' – यह तत्त्व 'देवताओं की भक्ति करनेवाले देवताओं को पाते हैं' प्रभृति पूर्वर्णित सिद्धान्तों का ही साधारण अनुवाद है (7.20 – 23; 9.25)। इस विषय का विवेचन हमने गीतारहस्य के तेरहवें प्रकरण में किया है (देखिए गीतार॰ पृ. 421 – 427)। तथापि जब यह कहा कि जिसकी जैसी बुद्धि हो उसे वैसा ही फल मिलता है, और वैसी बुद्धि का होना या न होना प्रकृतिस्वभाव के अधीन है, तब प्रश्न होता है कि फिर यह बुद्धि सुधर क्योंकर सकती है? इसका यह उत्तर है कि आत्मा स्वतन्त्र है, अतः देह का यह स्वभाव क्रमशः अभ्यास और वैराग्य के द्वारा धीरे-धीरे बदला जा सकता है। इस बात का विवेचन गीतारहस्य के दसवें प्रकरण में किया है ( पृ. 277 – 283)। अभी तो यही देखना है, कि श्रद्धा में भेद क्यों और कैसे होते है। इसी से कहा गया है कि प्रकृति-स्वभावानुसार श्रद्धा बदलती है। अब बतलाते है, कि प्रकृति भी सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणों से युक्त है, तब प्रत्येक मनुष्य में श्रद्धा के भी त्रिधा भेद किस प्रकार उत्पन्न होते है, और उनके परिणाम क्या होते हैं–
— Lokmanya Tilak