मूल श्लोक
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते ।असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
adeśakāle yaddānamapātrebhyaśca dīyate asatkṛtamavajñātaṃ tattāmasamudāhṛtam
अनुवाद
अयोग्य स्थान में, अयोग्य काल में, अपात्र मनुष्य को बिना सत्कार के अथवा अवहेलनापूर्वक जो दान दिया जाता है वह तामस दान कहलाता है।
टिप्पणी
आहार, यज्ञ, तप और दान के समान ही ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख की त्रिविधता का वर्णन अगले अध्याय में किया गया है (गी॰ 18.20 – 36)। इस अध्याय का गुणभेद-प्रकरण यहीं समाप्त हो चुका। अब ब्रह्मनिर्देश के आधार पर उक्त सात्त्विक कर्म की श्रेष्ठता और संग्राह्यता सिद्ध की जावेंगी। क्योंकि उपर्युक्त सम्पूर्ण विवेचन पर सामान्यतः यह शंका हो सकती है, कि कर्म सात्त्विक हो या राजस या तामस, कैसा भी क्यों न हो, है तो वह दुःखकारक और दोषमय ही, इस कारण सारे कर्मों का त्याग किए बिना ब्रह्म-प्राप्ति नहीं हो सकती। और जो यह बात सत्य है, तो फिर कर्म के सात्त्विक, राजस आदि भेद करने से लाभ ही क्या है? इस आक्षेप पर गीता का यह उत्तर है, कि कर्म के सात्त्विक, राजस और तामस भेद परब्रह्म से अलग नहीं है। जिस संकल्प में ब्रह्म का निर्देश किया गया है, उसी में सात्त्विक कर्मों का और सत्कर्मों का समावेश होता है, इससे निर्विवाद सिद्ध है, कि ये कर्म अध्यात्म दृष्टि से भी त्याज्य नहीं है (देखो गीतार॰ पृ. 245)। परब्रह्म के स्वरूप का मनुष्य को जो कुछ ज्ञान हुआ है वह सब 'ॐ तत्सत्' इन तीन शब्दों के निर्देश में ग्रथित है। इनमें से ॐ अक्षर ब्रह्म है, और उपनिषदों में इसका भिन्न-भिन्न अर्थ किया गया है (प्रश्न॰ 5; कठ॰ 2.15 – 17; तै॰ 1.8; छां॰ 1.1; मैत्र्यु॰ 6.3,4; माण्डूक्य 1 – 12)। और जब यह वर्णाक्षररूपी ब्रह्म ही जगत के आरम्भ में था, तब सब क्रियाओं का आरम्भ वहीं से होता है। 'तत् = वह' शब्द का अर्थ है सामान्य कर्म से परे का कर्म, अर्थात् निष्काम बुद्धि से फलाशा छोड़ कर किया हुआ सात्त्विक कर्म; और 'सत्' का अर्थ वह कर्म है, कि जो यद्यपि फलाशासहित हो, तो भी शास्त्रानुसार किया गया हो और शुद्ध हो। इस अर्थ के अनुसार निष्काम बुद्धि से किए हुए सात्त्विक कर्म का ही नहीं, वरन् शास्त्रानुसार किए हुए सत् कर्म का भी परब्रह्म के सामान्य और सर्वमान्य संकल्प में समावेश होता है; अतएव इन कर्मों को त्याज्य कहना अनुचित है। अन्त में 'तत्' और 'सत्' कर्मों के अतिरिक्त एक 'असत्' अर्थात् बुरा कर्म बच रहा। परन्तु वह दोनों लोकों में गर्ह्य माना गया है, इस कारण अन्तिम श्लोक में सूचित किया है, कि उस कर्म का इस संकल्प में समावेश नहीं होता। भगवान कहते है कि –-
— Lokmanya Tilak