मूल श्लोक
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
yattu pratyupakārārthaṃ phalamuddiśya vā punaḥ dīyate ca parikliṣṭaṃ taddānaṃ rājasaṃ smṛtam
अनुवाद
परन्तु (किए हुए) उपकार के बदले में, अथवा किसी फल की आशा रख बड़ी कठिनाई से, जो दान दिया जाता है वह राजस दान है।