मूल श्लोक
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् ।श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
vidhihīnamasṛṣṭānnaṃ mantrahīnamadakṣiṇam śraddhāvirahitaṃ yajñaṃ tāmasaṃ paricakṣate
अनुवाद
शास्त्रविधि-रहित, अन्नदान-विहीन, बिना मन्त्रों का, बिना दक्षिणा का और श्रद्धा से शून्य यज्ञ तामस यज्ञ कहलाता है।
टिप्पणी
आहार और यज्ञ के समान तप के भी तीन भेद हैं। पहले, तप के कायिक, वाचिक और मानसिक ये तीन भेद किए हैं; फिर इन तीनों में से प्रत्येक में सत्त्व, रज और तम गुणों से जो त्रिविधता होती है, उसका वर्णन किया है। यहाँ पर, तप शब्द से यह संकुचित अर्थ विवक्षित नहीं है कि जंगल में जा कर पातंजल-योग के अनुसार शरीर को कष्ट दिया करें। किन्तु मनु का किया हुए 'तप' शब्द का यह व्यापक अर्थ ही गीता के निम्न लिखित श्लोकों में अभिप्रेत है कि यज्ञ-याग आदि कर्म, वेदाध्ययन, अथवा चातुर्वर्ण्य के अनुसार जिसका जो कर्तव्य हो – जैसे क्षत्रिय का कर्तव्य युद्ध करना है और वैश्य का व्यापार इत्यादि – वही उसका तप है (मनु॰ 11.236)।
— Lokmanya Tilak